सुषमा के स्नेहिल सृजन
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घनाक्षरी प्रेम की पराकाष्ठा
सुषमा के स्नेहिल सृजन
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चौंसठ कलाएं चंद्र सुषमा स्वर्णिम झड़ी
प्रेम की पराकाष्ठा
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औषधीय गुण भरे, अमृत की बूँद झरे, आश्विन धवल पक्ष, शरद की पूर्णिमा।
प्रेम की पराकाष्ठा
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आरती उतारूँ नाथ, झुकाऊँ मैं निज माथ, कीर्तन भजन गाऊँ, ईश्वर की महिमा।
प्रेम की पराकाष्ठा
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गोपियाँ श्रीकृष्ण संग, रासलीला नृत्य रंग, नीर छवि देख राधा, चंद्रदेव प्रतिमा।
प्रेम की पराकाष्ठा
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‘सुषमा’ स्वर्णिम झड़ी, आध्यात्मिक शुभ घड़ी, रात्रि जागरण विधि, दिवस की गरिमा।(१)
प्रेम की पराकाष्ठा
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आनंद उल्लास भरे, मनोहारी नृत्य करें, मान सरोवर नीर, रासलीला सरिता।
प्रेम की पराकाष्ठा
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प्रेम की है पराकाष्ठा, धर्म पर दृढ़ आस्था, ब्रजवासी गोप-ग्वाल, उत्साहित प्रविता।
प्रेम की पराकाष्ठा
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अगली सुबह फिर, स्वास्थ्य लाभकारी खीर, प्रसाद ग्रहण कर, खुश हुईं बनिता।
प्रेम की पराकाष्ठा
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शरद पूनम तिथि, मंगल पूजन विधि, चौषठ कलाएँ चंद्र, पुण्यलाभ दिविता।(२)
”सुषमा प्रेम पटेल (रायपुर छ.ग.)
लेखिका
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