सुषमा के स्नेहिल सृजन
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आलू भी उछल पड़ा
आलू भी उछल पड़ा
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आलू की ऐसी कहानी जो आपके मन को जरूर गुदगुदाई
आलू भी उछल पड़ा
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आलू भी उछल पड़ा, रसोई से भाग खड़ा, आसमान चढ़ा भाव, थोड़ा-थोड़ा खाइये।
आलू भी उछल पड़ा
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बेसन पकौड़ा कढ़ी, बना लेना चाहे बड़ी, नेह का मशाला डाल, प्रेम से खिलाइये।
आलू भी उछल पड़ा
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अचार सलाद प्याज़, आनंद उठाओ आज, अभावों में खुश रह, जीवन बिताइये।
आलू भी उछल पड़ा
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लाल-लाल गोल बड़ा, टमाटर भी बोल पड़ा, चले नहीं मेरे बिन, स्वाद कैसे पाइये।
”सुषमा प्रेम पटेल (रायपुर छ.ग.)
लेखिका
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