दो साल के बेटे की मां ने जीता ‘मिसेज इंडिया यूनिवर्स एशिया 2026’ का खिताब
मां की जिम्मेदारियों से ताज तक, दीपाक्षा ने रचा अपना इतिहास

बच्चों को पढ़ाने के साथ खुद के सपनों को भी दी उड़ान, परिवार बना हर कदम का सहारा
रायपुर : मंच पर जब दीपाक्षा जैन ने कदम रखा तो उनके साथ सिर्फ उनका आत्मविश्वास नहीं था, बल्कि एक मां, पत्नी, शिक्षिका और उद्यमी के रूप में जी गई पूरी जिंदगी थी। कभी बच्चे की जिम्मेदारी, कभी घर-परिवार की चिंता और कभी बच्चों के भविष्य को संवारने की कोशिश… इन सबके बीच उन्होंने अपने सपने को कहीं पीछे नहीं छूटने दिया। आखिरकार वही सपना ताज बनकर उनके सिर सजा। दुर्ग की बेटी और रायपुर की बहू दीपाक्षा जैन ने वीएमएस प्रेजेंट्स मिस एंड मिसेज इंडिया यूनिवर्स-सीजन 7 में ‘मिसेज इंडिया यूनिवर्स एशिया 2026’ का खिताब अपने नाम किया।
दो साल के नन्हे बेटे की मां दीपाक्षा के लिए यह सफर आसान नहीं था। परिवार की जिम्मेदारियों के साथ प्रतियोगिता की तैयारी के लिए समय निकालना अपने आप में चुनौती थी। लेकिन उन्होंने हर दिन के छोटे-छोटे समय को अपने सपने के नाम किया। यही जिद आखिरकार उनकी पहचान बन गई।

प्रस्तुति में दिखाई अपनी जिंदगी
प्रतियोगिता के टैलेंट राउंड में दीपाक्षा ने नृत्य के माध्यम से मां, बच्चे और परिवार के रिश्ते की खूबसूरती को प्रस्तुत किया। क्रिएटिविटी राउंड में उनकी ड्रेस और प्रस्तुति ने एक बेटी से पत्नी, पत्नी से मां और फिर अपने सपनों के लिए संघर्ष करती महिला तक की यात्रा को सामने रखा।
क्वेश्चन-आंसर राउंड में उनकी स्पष्ट सोच और आत्मविश्वास ने अलग छाप छोड़ी। ग्रेसफुल वॉक, व्यक्तित्व, पहनावा और मंच पर आत्मविश्वास ने भी उनकी प्रस्तुति को मजबूती दी।
बच्चों के सपनों को संवारते-संवारते खुद का सपना भी पूरा किया
दीपाक्षा जैन जैनम एकेडमी की संस्थापक हैं। बच्चों को शिक्षा और संस्कार देने के साथ वे उनकी प्रतिभा निखारने के लिए काम करती हैं। एकेडमी में 50 से अधिक जरूरतमंद और आर्थिक रूप से कमजोर बच्चों को नि:शुल्क शिक्षा दी जा रही है।
उनकी कहानी की खास बात यही है कि वे दूसरों के बच्चों का भविष्य संवारते हुए अपने सपनों के लिए भी लड़ती रहीं। उनका मानना है कि किसी बच्चे की परिस्थितियां उसके सपनों के रास्ते में दीवार नहीं बननी चाहिए।
ढोल-नगाड़ों से हुआ स्वागत, बेटे ने मां को लगाया गले
इस सफर में पति अतुल जैन, मां माया, नन्हे बेटे और पूरे परिवार का साथ दीपाक्षा के लिए सबसे बड़ा सहारा रहा। खिताब जीतकर घर लौटने पर परिवार ने ढोल-नगाड़ों के साथ उनका स्वागत किया। इस दौरान नन्हे बेटे का अपनी मां का स्वागत करना सबसे भावुक पल रहा।
दीपाक्षा ने अपनी सफलता के लिए वीएमएस, कविता मैम और जितेंद्र सर का आभार जताया। उनके लिए यह सिर्फ सिर पर सजा एक क्राउन नहीं, बल्कि उस विश्वास की जीत है कि जिम्मेदारियां सपनों को रोक सकती हैं, लेकिन अगर हौसला जिंदा हो तो सपनों की उड़ान थमती नहीं।

