छत्तीसगढ़

CG High Court Verdict: छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट का बड़ा फैसला – बिना शादी साथ रहने वाली महिला को भी मिल सकता है भरण-पोषण का अधिकार

CG High Court Verdict: छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने घरेलू हिंसा से महिलाओं के संरक्षण अधिनियम, 2005 से जुड़े एक मामले में महत्वपूर्ण टिप्पणी की है। कोर्ट ने कहा कि यदि महिला और पुरुष लंबे समय तक पति-पत्नी की तरह साथ रहते हैं, तो महिला घरेलू संबंध के दायरे में आ सकती है और परिस्थितियों के अनुसार भरण-पोषण पाने की हकदार होगी। केवल यह तर्क कि दोनों का विवाह कानूनी रूप से वैध नहीं था, महिला के अधिकार को खत्म नहीं करता। चीफ जस्टिस रमेश सिन्हा की सिंगल बेंच ने जेएमएफसी कोर्ट द्वारा महिला को दिए गए 4 हजार रुपए प्रतिमाह भरण-पोषण के आदेश को बरकरार रखा। कोर्ट ने पुरुष की पुनरीक्षण याचिका खारिज कर दी।

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पति ने विवाह वैध नहीं होने का दिया तर्क

मामले में पुरुष ने हाईकोर्ट में याचिका दायर कर निचली अदालत के आदेश को चुनौती दी थी। उसका तर्क था कि संबंधित महिला उसकी कानूनी पत्नी नहीं है और दोनों वर्तमान में साथ भी नहीं रहते हैं। इसी आधार पर उसने महिला को भरण-पोषण दिए जाने के आदेश को चुनौती दी।

बिना विवाह के लंबे समय तक साथ रहे

मामला जांजगीर-चांपा के पामगढ़ क्षेत्र निवासी निरंजन साहू और बिलासपुर निवासी एक महिला से जुड़ा है। दोनों बिना औपचारिक विवाह के लंबे समय तक साथ रह रहे थे। महिला ने घरेलू हिंसा से महिलाओं के संरक्षण अधिनियम की धारा 12 के तहत जेएमएफसी बिलासपुर की अदालत में आवेदन देकर भरण-पोषण की मांग की थी।

जेएमएफसी ने तय किया था 4 हजार रुपए मासिक भरण-पोषण

महिला की याचिका पर सुनवाई के बाद जेएमएफसी अदालत ने उसे 4 हजार रुपए प्रतिमाह भरण-पोषण देने का आदेश दिया था। इसके खिलाफ पुरुष ने पुनरीक्षण याचिका दायर की। बाद में विशेष न्यायाधीश के फैसले को भी चुनौती देते हुए मामला हाईकोर्ट पहुंचा।

घरेलू संबंध के दायरे में आ सकता है ऐसा रिश्ता

हाईकोर्ट ने मामले में यह स्पष्ट किया कि किसी संबंध को केवल विवाह की वैधता के आधार पर नहीं देखा जा सकता। यदि महिला और पुरुष लंबे समय तक पति-पत्नी की तरह साथ रहे हैं और उनका संबंध घरेलू संबंध की प्रकृति रखता है, तो संबंधित कानून के तहत महिला को मिलने वाली सुरक्षा और राहत पर विचार किया जा सकता है।

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हाईकोर्ट ने खारिज की पुनरीक्षण याचिका

चीफ जस्टिस रमेश सिन्हा की सिंगल बेंच ने निचली अदालत द्वारा निर्धारित 4 हजार रुपए मासिक भरण-पोषण के आदेश को बरकरार रखा। कोर्ट ने पुरुष की पुनरीक्षण याचिका खारिज कर दी। इस फैसले से स्पष्ट हुआ कि लंबे समय तक पति-पत्नी की तरह साथ रहने वाले रिश्ते में महिला के अधिकारों पर केवल वैध विवाह न होने के आधार पर रोक नहीं लगाई जा सकती।

News Desk

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