गैस संकट: क्या ईरान युद्ध के चलते भारत में पीएनजी की सप्लाई पर भी असर होगा

ईरान युद्ध ने भारत के लिक्विफ़ाइड पेट्रोलियम गैस (एलपीजी) बाज़ार को पहले ही हिलाकर रख दिया है.
अब ऊर्जा ज़रूरत की एक और महत्वपूर्ण कड़ी इसके दायरे में आती नज़र आ रही है: देश का तेज़ी से विस्तार करता प्राकृतिक गैस (पीएनजी) का पाइपलाइन नेटवर्क, यानी पाइपलाइन के ज़रिये घरों और व्यवसायों तक पहुंचाई जाने वाली गैस.
इस प्राकृतिक गैस की मांग उर्वरक संयंत्रों, उद्योगों और गैस से चलने वाले बिजली संयंत्रों के साथ-साथ शहरी गैस नेटवर्क से आती है, जो घरों को पीएनजी और वाहनों को सीएनजी (कंप्रेस्ड नेचुरल गैस) की आपूर्ति करते हैं.
इनमें से, घरों तक शहरी गैस की आपूर्ति सबसे तेज़ी से बढ़ रही है, और शहरी भारत में नेटवर्क के विस्तार के साथ इसमें लगातार वृद्धि हो रही है.
इस प्रयास का असर ज़मीनी स्तर पर भी दिखाई देता है: भारत में अब 1.5 करोड़ से अधिक पीएनजी कनेक्शन हैं, और यह संख्या तेज़ी से बढ़ रही है क्योंकि सरकार परिवारों को सिलेंडर के बजाय पाइप से आने वाली गैस का उपयोग करने के लिए प्रोत्साहित कर रहे हैं.
ईरान के साथ युद्ध के कारण भारत में खाना पकाने की गैस की आपूर्ति पर दबाव बढ़ गया है. इसी के साथ-साथ, सीएनजी वाहनों की मांग में भी लगातार वृद्धि हुई है, और अब सीएनजी भारत में पेट्रोल के बाद दूसरा सबसे बड़ा ऑटो ईंधन बन गया है.
अगर एलपीजी ले जाने वाले टैंकरों को होर्मुज़ स्ट्रेट से गुज़रने में कठिनाई हो रही है, तो कई शहरी भारतीय घरों में यह सवाल भी पूछा जाने लगा है, क्या उनकी रसोई की पाइपलाइनों में गैस की आपूर्ति भी इसी तरह प्रभावित हो सकती है?

