UP News: यूपी सरकार का रसोइयों को बड़ा गिफ्ट, ₹2000 से बढ़कर ₹3000 हुआ मासिक मानदेय

लखनऊ : उत्तर प्रदेश सरकार ने परिषदीय प्राथमिक और उच्च प्राथमिक विद्यालयों में मिड-डे मील बनाने वाले रसोइयों के मासिक मानदेय में 1000 रुपये की बढ़ोतरी की है। अब रसोइयों को हर महीने 2000 रुपये के बजाय 3000 रुपये मिलेंगे। मध्याह्न भोजन प्राधिकरण के निदेशक प्रेम रंजन सिंह ने शनिवार को सभी जिलों के बेसिक शिक्षा अधिकारियों और वित्त एवं लेखाधिकारियों को बढ़ा हुआ मानदेय जल्द जारी करने के निर्देश दिए हैं। सरकार की योजना दिवाली से पहले प्रदेश के करीब 3.50 लाख रसोइयों के बैंक खातों में बढ़ी हुई राशि भेजने की है।
3.50 लाख रसोइयों को मिलेगा लाभ
मिड-डे मील योजना के तहत सरकारी स्कूलों में बच्चों के लिए भोजन तैयार करने वाले रसोइये लंबे समय से मानदेय बढ़ाने की मांग कर रहे थे। सरकार ने 22 अगस्त 2026 को कैबिनेट बाई सर्कुलेशन के जरिए मानदेय में 1000 रुपये की वृद्धि को मंजूरी दी थी।
इस फैसले के बाद रसोइयों को अब प्रतिमाह 3000 रुपये मिलेंगे। बढ़ी हुई राशि का भुगतान जल्द शुरू करने के लिए संबंधित अधिकारियों को निर्देश दिए गए हैं।
सरकार पर हर साल 424 करोड़ रुपये का अतिरिक्त भार
मानदेय बढ़ाने से उत्तर प्रदेश सरकार के खजाने पर हर महीने करीब 35.35 करोड़ रुपये का अतिरिक्त वित्तीय भार पड़ने का अनुमान है। सालाना आधार पर यह राशि लगभग 424 करोड़ रुपये होगी।
रसोइयों के मानदेय में इससे पहले भी अलग-अलग वर्षों में बढ़ोतरी की गई थी। शुरुआत में उन्हें 1000 रुपये प्रतिमाह मिलते थे। वर्ष 2019 में इसे बढ़ाकर 1500 रुपये और 2022 में 2000 रुपये किया गया था। अब सरकार ने इसे बढ़ाकर 3000 रुपये प्रतिमाह कर दिया है।
हाईकोर्ट में भी उठ चुका है न्यूनतम वेतन का मुद्दा
मिड-डे मील रसोइयों के मानदेय का मामला इलाहाबाद हाईकोर्ट में भी उठ चुका है। चंद्रावती देवी बनाम उत्तर प्रदेश सरकार एवं अन्य मामले में 15 दिसंबर 2020 को न्यायमूर्ति पंकज भाटिया ने रसोइयों को न्यूनतम वेतन देने का निर्देश दिया था। आदेश में 1000 रुपये मासिक भुगतान को बंधुआ मजदूरी जैसा बताते हुए संविधान के अनुच्छेद 23 का उल्लेख किया गया था। यह अनुच्छेद बेगार और अन्य प्रकार के जबरन श्रम पर रोक लगाता है।
याचिकाकर्ता चंद्रावती देवी बस्ती जिले के पिनसार स्थित एक बेसिक प्राथमिक विद्यालय में मिड-डे मील रसोइया थीं। उन्होंने याचिका में बताया था कि वह 14 वर्षों से 1000 रुपये प्रतिमाह मानदेय पर काम कर रही थीं और 1 अगस्त 2019 को उन्हें सेवा से हटा दिया गया था।
हालांकि, 15 दिसंबर 2020 के आदेश को विशेष अपील संख्या 123/2021 में निरस्त कर दिया गया था। इसके बाद 8 फरवरी 2023 को हाईकोर्ट की लखनऊ पीठ ने रसोइयों के मानदेय से जुड़े मामले में फिर फैसला सुनाते हुए न्यूनतम मजदूरी और बकाया भुगतान के निर्देश दिए। खबर में दिए गए विवरण के अनुसार, इसके बावजूद रसोइयों को अभी निर्धारित न्यूनतम वेतन नहीं मिल रहा है।
उत्तर प्रदेश में न्यूनतम मजदूरी की दरें कितनी हैं?
उत्तर प्रदेश में 1 अप्रैल 2026 से लागू न्यूनतम मजदूरी दरों के अनुसार, अकुशल, अर्धकुशल और कुशल श्रमिकों के लिए अलग-अलग मासिक दरें निर्धारित हैं। उपलब्ध आंकड़ों के मुताबिक, नगर निगम क्षेत्रों, गौतम बुद्ध नगर और गाजियाबाद में दरें इस प्रकार हैं।
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| श्रमिक श्रेणी | नगर निगम क्षेत्र | गौतम बुद्ध नगर | गाजियाबाद |
|---|---|---|---|
| अकुशल | ₹13,006 | ₹13,690 | ₹12,356 |
| अर्धकुशल | ₹14,306 | ₹15,059 | ₹13,590 |
| कुशल | ₹16,025 | ₹16,868 | ₹15,224 |
मानदेय बढ़ा, लेकिन न्यूनतम मजदूरी का सवाल बरकरार
सरकार के इस फैसले से मिड-डे मील रसोइयों को हर महीने पहले से 1000 रुपये अधिक मिलेंगे। हालांकि, मानदेय और श्रमिकों के लिए निर्धारित न्यूनतम मजदूरी दो अलग-अलग व्यवस्थाएं हैं। ऐसे में मानदेय में बढ़ोतरी के बावजूद रसोइयों के न्यूनतम वेतन से जुड़ा मुद्दा महत्वपूर्ण बना हुआ है।

