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कश्मीर पर ट्रंप की ‘शांति पहल’: क्या भारत को किसी और की जरूरत है?

ट्रम्प का कश्मीर में दखल: क्या है भारत का रुख?- कश्मीर मुद्दे पर ट्रम्प के बार-बार बोलने से सोशल मीडिया पर बहस छिड़ गई है। क्या वाकई ट्रम्प कश्मीर में शांतिदूत बन सकते हैं या ये सिर्फ़ एक दिखावा है? आइए जानते हैं भारत का रुख।

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ट्रम्प की ‘शांतिदूत’ वाली कोशिश- हाल ही में, पूर्व अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने फिर से कश्मीर मुद्दे पर अपनी राय रखी और भारत-पाकिस्तान के बीच सुलह कराने की इच्छा जताई। उन्होंने कहा कि अगर ये विवाद न रुका होता, तो बड़े नुकसान हो सकते थे। साथ ही, उन्होंने खुद को इस मामले में मददगार बताते हुए कहा कि वो भारत-पाकिस्तान के साथ मिलकर कश्मीर मुद्दे का हल निकालना चाहते हैं, भले ही इसमें ‘हज़ार साल’ क्यों न लग जाएं। इस बयान के बाद सोशल मीडिया पर कई लोगों ने ट्रम्प को पाकिस्तान के अस्तित्व की याद दिलाई, जो 1947 में बना था। ट्रम्प के इस बयान ने एक बार फिर कश्मीर मुद्दे पर बहस छेड़ दी है। क्या वाकई ट्रम्प की ये कोशिश कामयाब होगी या ये सिर्फ़ एक दिखावा है?

भारत का साफ रुख: कश्मीर हमारा है, रहेगा!-

भारत ने हमेशा से ही कश्मीर को अपना अभिन्न अंग माना है। चाहे कोई भी सरकार हो, कश्मीर मुद्दा हमेशा ही संवेदनशील और गैर-मोलभाव वाला रहा है। ‘कश्मीर हमारा था, है और रहेगा’ – ये सिर्फ़ एक नारा नहीं, बल्कि भारत का मज़बूत रुख है। भारत के संविधान में भी कश्मीर की स्थिति स्पष्ट रूप से दर्ज है। 1947 में जम्मू-कश्मीर का भारत में विलय हुआ था और अनुच्छेद 370 (जो अब हट चुका है) भी यही दर्शाता था कि जम्मू-कश्मीर भारत का अभिन्न अंग है। इसलिए, किसी भी बाहरी हस्तक्षेप को भारत स्वीकार नहीं करता। भारत का मानना है कि कश्मीर मुद्दे का हल भारत और पाकिस्तान के बीच द्विपक्षीय बातचीत से ही निकलेगा।

PoK और भारत की चिंता- आज जो विवाद है, उसकी जड़ें पाकिस्तान के उस हिस्से में हैं जिसे भारत ‘पाक अधिकृत कश्मीर’ यानी PoK कहता है। आज़ादी के वक्त जम्मू-कश्मीर ने भारत में शामिल होने का फैसला लिया था, लेकिन पाकिस्तान ने उसके कुछ हिस्सों पर कब्ज़ा कर लिया। यही वजह है कि ये मुद्दा अंतरराष्ट्रीय मंचों पर उठता रहता है। लेकिन भारत का मानना है कि इस मामले में किसी तीसरे पक्ष की ज़रूरत नहीं है। कश्मीर का हल भारत और पाकिस्तान के बीच ही निकलेगा। इसलिए, ट्रम्प का ‘शांति प्रस्ताव’ भारत के लिए महज़ एक दिखावा लगता है, जिसे न आज तक स्वीकारा गया और न ही आगे किया जाएगा।

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