
नेपाल में हिंसा पर हरीश रावत का बयान: युवाओं का गुस्सा लोकतांत्रिक ढांचे पर क्यों भड़का?
नेपाल में क्यों भड़की हिंसा? पूर्व CM हरीश रावत ने खोला राज़!
Thank you for reading this post, don't forget to subscribe!सत्ता और संस्थानों पर युवाओं का गुस्सा-नेपाल में हाल ही में जो हिंसा भड़की है, उसने पूरे देश को हिला कर रख दिया है। पूर्व मुख्यमंत्री हरीश रावत ने इस पर चिंता जताते हुए कहा कि जिस तरह से गुस्सा सिर्फ सरकार या प्रशासन पर नहीं, बल्कि संसद जैसी लोकतांत्रिक संस्थाओं और यहाँ तक कि पूजा-पाठ की जगहों पर भी उतरा, यह बहुत ही चिंताजनक बात है। रावत का मानना है कि जब नौजवानों को आगे बढ़ने का मौका नहीं मिलता और उनकी उम्मीदों को दबा दिया जाता है, तो फिर ऐसे ही गुस्से और हिंसा के रूप में नतीजा सामने आता है। नेपाल का यह हाल सिर्फ उनके लिए ही नहीं, बल्कि दुनिया भर के उन सभी देशों के लिए एक बड़ी चेतावनी है जहाँ लोकतंत्र है।
समाजशास्त्रियों के लिए खुला अध्ययन का मैदान-हरीश रावत ने इस बात पर भी जोर दिया कि जिस तरह से नौजवानों ने सोच-समझकर नेताओं के घरों और उनकी दौलत को निशाना बनाया, यह समाजशास्त्रियों और लोकतंत्र के जानकारों के लिए एक बड़ा अध्ययन का विषय है। उन्होंने कहा कि जब गलत काम यानी भ्रष्टाचार, व्यवस्था का आम हिस्सा बन जाता है और पैसे की लूट-खसोट को ही सही मानने लगते हैं, तो लोगों का सब्र जवाब दे जाता है। इसके अलावा, नौकरी न मिलना, देश छोड़कर जाना, गरीबी और अमीरी के बीच बढ़ती खाई और कमज़ोर लोगों, जिनमें महिलाएं भी शामिल हैं, पर होने वाले ज़ुल्म, ये सब मिलकर आग में घी का काम करते हैं।
बेरोजगारी और पलायन: गुस्से की जड़-रावत के अनुसार, नेपाल में बढ़ती बेरोजगारी और युवाओं का देश छोड़कर जाना, इन सबने नौजवानों के गुस्से को और भी बढ़ा दिया है। जब कोई सरकार अपने लोगों को नौकरी नहीं दे पाती और उनके भविष्य को सुरक्षित करने में नाकाम रहती है, तो धीरे-धीरे उम्मीदें खत्म होने लगती हैं। इसी उम्मीद के खत्म होने से विद्रोह पैदा होता है। नेपाल की यह मौजूदा हालत इस बात का जीता-जागता सबूत है कि जब नौजवानों के सपनों को रौंद दिया जाता है, तो वे सीधे-सीधे पूरी व्यवस्था पर ही सवाल उठाने लगते हैं। यह सिर्फ नेपाल की कहानी नहीं, बल्कि हर लोकतंत्र के लिए एक सबक है।
1990 की यादें ताज़ा-हरीश रावत ने नेपाल की इस हालत को अपने पुराने दिनों से जोड़ा। उन्होंने कहा कि यह सब देखकर उन्हें 1990 का दौर याद आ जाता है। उस समय भी नेपाल में व्यवस्था चरमरा रही थी और लोगों की उम्मीदें टूटी हुई थीं। रावत ने बताया कि उस समय नेपाली कांग्रेस का काठमांडू में एक बड़ा अधिवेशन हुआ था, जिसमें भारत की तरफ से वे खुद भी एक प्रतिनिधिमंडल का हिस्सा थे। उस अधिवेशन में उनके साथ चंद्रशेखर, सुब्रमण्यम स्वामी, सीताराम येचुरी और मशहूर पत्रकार अकबर जैसे बड़े-बड़े लोग भी मौजूद थे।
युवाओं की शक्ति को सही दिशा देना ज़रूरी-रावत ने साफ़ तौर पर कहा कि किसी भी देश के लिए उसके नौजवान उसकी सबसे बड़ी ताकत होते हैं। लेकिन जब यही ताकत नौकरी न मिलने और भ्रष्टाचार से निराश हो जाती है, तो वह व्यवस्था को तोड़ने का काम करने लगती है। उन्होंने कहा कि नेपाल में जो हुआ, उससे यह साफ होता है कि सरकारों को नौजवानों की इस ऊर्जा को सही दिशा देनी चाहिए। अगर ऐसा नहीं हुआ, तो हर लोकतांत्रिक व्यवस्था के सामने यही खतरा मंडराता रहेगा।

