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धामी सरकार पर मदरसा बंद करने का विवाद: हाईकोर्ट ने मांगा जवाब, जानिए पूरा मामला

उत्तराखंड में मदरसों पर ताला: क्या है पूरा मामला?

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बिना नोटिस के मदरसों पर कार्रवाई, हाईकोर्ट ने मांगा जवाब-उत्तराखंड में इन दिनों मदरसों को अचानक बंद किए जाने का मामला गरमाया हुआ है। सरकार ने किसी भी पूर्व सूचना के बिना कई मदरसों पर ताला लगा दिया है, जिसके बाद से मुस्लिम समुदाय में काफी नाराजगी है। इस फैसले को कई अल्पसंख्यक संगठनों ने अपने धार्मिक और शैक्षिक अधिकारों पर सीधा हमला बताया है। इस पूरे मामले को जमीयत उलमा-ए-हिंद के अध्यक्ष मौलाना अरशद मदनी ने कोर्ट में उठाया है। उनका कहना है कि भारत का संविधान अल्पसंख्यकों को अपने शिक्षण संस्थान चलाने की आजादी देता है, और सरकार का यह कदम उस अधिकार का उल्लंघन करता है। इस मुद्दे पर अब उत्तराखंड हाईकोर्ट ने सरकार से जवाब तलब किया है।

हाईकोर्ट का सख्त रुख: सरकार पर बढ़ा दबाव-उत्तराखंड हाईकोर्ट ने मदरसों को बंद करने की इस कार्रवाई पर सरकार को नोटिस जारी कर दिया है। कोर्ट ने साफ तौर पर कहा है कि सरकार को इस मामले में छह हफ्तों के अंदर अपना विस्तृत जवाब पेश करना होगा। याचिकाकर्ताओं का आरोप है कि मदरसों को बंद करने का यह कदम बिना किसी कानूनी आधार और उचित सूचना के उठाया गया है, जो कि एक समुदाय के अधिकारों के साथ खिलवाड़ है। इस नोटिस के जारी होने के बाद, धामी सरकार पर यह बताने का दबाव बढ़ गया है कि आखिर मदरसों को बंद करने के पीछे सरकार का असली मकसद क्या है और यह निर्णय किस आधार पर लिया गया है।

विवाद की जड़: नया अल्पसंख्यक शिक्षा विधेयक-2025-इस पूरे विवाद की जड़ में है उत्तराखंड सरकार द्वारा विधानसभा में पास किया गया ‘उत्तराखण्ड अल्पसंख्यक शिक्षा विधेयक-2025’। इस विधेयक के अनुसार, राज्य में मदरसा शिक्षा बोर्ड अधिनियम और गैर-सरकारी अरबी-फारसी मदरसा मान्यता नियम 1 जुलाई 2026 से समाप्त हो जाएंगे। इसका सीधा मतलब यह है कि भविष्य में मदरसों को केवल नई व्यवस्था के तहत ही मान्यता मिलेगी। सरकार का कहना है कि इस नए कानून से शिक्षा की गुणवत्ता में सुधार होगा और सभी समुदायों को समान और पारदर्शी तरीके से मान्यता दी जाएगी। इस विधेयक ने कई अल्पसंख्यक समूहों को चिंतित कर दिया है।

सभी अल्पसंख्यक संस्थानों पर लागू होगा नया कानून-मुख्यमंत्री धामी ने स्पष्ट किया है कि यह नया कानून सिर्फ मुस्लिम मदरसों तक ही सीमित नहीं रहेगा, बल्कि इसका असर सिख, जैन, ईसाई, बौद्ध और पारसी समुदायों के शैक्षणिक संस्थानों पर भी पड़ेगा। सरकार का मानना है कि इस कानून से सभी अल्पसंख्यक संस्थानों को एक जैसी व्यवस्था के तहत लाया जाएगा, जिससे विद्यार्थियों के हितों की रक्षा होगी और शिक्षा का स्तर भी ऊंचा उठेगा। हालांकि, कई मुस्लिम संगठनों का यह आरोप है कि सरकार का असली इरादा मदरसों को बंद करवाना है, और इसी वजह से यह विवाद लगातार बढ़ता जा रहा है।

सरकार के हाथ में होगी निगरानी की शक्ति-इस नए विधेयक के लागू होने के बाद, राज्य सरकार को अल्पसंख्यक शिक्षण संस्थानों के संचालन पर कड़ी निगरानी रखने और उन्हें आवश्यक निर्देश जारी करने का अधिकार मिल जाएगा। मुख्यमंत्री का दावा है कि यह कदम राज्य की शिक्षा व्यवस्था को एक नई दिशा देगा और शैक्षिक उत्कृष्टता को बढ़ावा देगा, साथ ही सामाजिक सद्भाव को भी मजबूत करेगा। लेकिन, दूसरी ओर विपक्ष और कई धार्मिक संगठन इसे अल्पसंख्यक अधिकारों पर एक बड़ा हमला मान रहे हैं। अब यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि सरकार हाईकोर्ट में अपना पक्ष कैसे रखती है और इस विवाद का समाधान कैसे निकलता है।

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