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29 कानूनों की जगह सिर्फ 4 कोड, जानिए नए लेबर लॉ की 20 बड़ी बातें

नई दिल्ली । केंद्र सरकार ने शुक्रवार को एक बड़ा कदम उठाते हुए 5 साल पहले बनाए गए 4 लेबर कोड्स को लागू करने का ऐलान किया है। ये नए कानून 29 पुराने कानूनों की जगह लेंगे।

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नए नियमों के तहत, अब एक साल काम करने वाले निश्चित अवधि के कर्मचारियों को भी ग्रेच्युटी का फायदा मिलेगा। साथ ही, सामाजिक सुरक्षा का दायरा सभी मजदूरों के लिए बढ़ा दिया गया है। अब हर मजदूर को PF, ESIC, बीमा और अन्य सामाजिक सुरक्षा के लाभ मिलेंगे। इसके अलावा, 40 साल से ज्यादा उम्र के कर्मचारियों के लिए कई जगहों पर साल में एक बार स्वास्थ्य जांच करवाना भी जरूरी कर दिया गया है।
भारत में अब नए लेबर कोड आ गए हैं। ये कोड कई पुराने नियमों को मिलाकर एक आसान और आधुनिक ढांचा तैयार करते हैं। इनका मकसद है कि नौकरी देना, तनख्वाह, सामाजिक सुरक्षा और काम करने की जगह के नियम सभी के लिए एक जैसे और साफ हों। इन नए नियमों से कंपनियों के लिए काम करना आसान होगा और मजदूरों को बेहतर सुरक्षा मिलेगी।

20 बड़े पॉइंट्स
अब सभी कर्मचारियों के लिए न्यूनतम मजदूरी तय की जाएगी। इसमें असंगठित क्षेत्र के मजदूर भी शामिल होंगे। सरकार एक ‘स्टैच्यूटरी फ्लोर वेज’ यानी न्यूनतम मजदूरी की सीमा तय करेगी। यह सीमा लोगों के रहने के लिए जरूरी न्यूनतम खर्च के आधार पर तय होगी। राज्यों को अपनी न्यूनतम मजदूरी इस फ्लोर वेज से ऊपर ही रखनी होगी।

‘वेजेज’ यानी मजदूरी की परिभाषा को भी बदला गया है। अब इसमें बेसिक पे, महंगाई भत्ता और रिटेनिंग अलाउंस शामिल होंगे। खास बात यह है कि कुल कमाई का कम से कम 50% हिस्सा बेसिक पे होना चाहिए। इससे यह पक्का होगा कि कंपनियां सिर्फ भत्ते बढ़ाकर मजदूरों की कुल कमाई को ज्यादा न दिखाएं।

महिलाओं के लिए लैंगिक समानता पर जोर दिया गया है। अब समान काम के लिए भर्ती और सेवा शर्तों में लिंग के आधार पर कोई भेदभाव नहीं होगा। यानी महिला और पुरुष को एक जैसे काम के लिए बराबर वेतन मिलेगा।

सभी कर्मचारियों को समय पर तनख्वाह मिले, इसके लिए ‘यूनिवर्सल वेज पेमेंट कवरेज’ लाया गया है। यह उन सभी कर्मचारियों पर लागू होगा जो हर महीने 24,000 रुपये तक कमाते हैं।

ओवरटाइम करने पर अब मजदूरों को सामान्य मजदूरी से कम से कम दोगुना पैसा मिलेगा।

कंपनियों के लिए छंटनी , रिट्रेंचमेंट या बंद करने के लिए अब ज्यादा बड़े पैमाने पर मजदूरों को प्रभावित करना होगा। पहले जहां 100 मजदूरों पर मंजूरी लेनी पड़ती थी, अब यह सीमा बढ़ाकर 300 कर दी गई है। राज्य सरकारें चाहें तो इसे और भी बढ़ा सकती हैं।
वर्क-फ्रॉम-होम को अब सर्विस सेक्टर में बढ़ावा दिया जाएगा। इसमें कंपनी और कर्मचारी आपसी सहमति से काम करने के तरीके तय कर सकेंगे।

काम से जुड़े विवादों को जल्दी सुलझाने के लिए अब दो सदस्यों वाली ट्रिब्यूनल बनाई जाएगी। इससे फैसले जल्दी होंगे और काम रुकेगा नहीं।

हड़ताल करने से पहले अब कर्मचारियों को कम से कम 14 दिन का नोटिस देना होगा। इससे बातचीत के लिए समय मिलेगा और अचानक हड़तालें कम होंगी। नोटिस पीरियड के दौरान और बातचीत के समय हड़ताल करना मना होगा।

गिग और प्लेटफॉर्म वर्कर्स, जैसे कि डिलीवरी बॉय या कैब ड्राइवर, को भी अब सामाजिक सुरक्षा का लाभ मिलेगा। इसके लिए एग्रीगेटर्स को अपने टर्नओवर का 1-2% टैक्स देना होगा, जिससे इन वर्कर्स के लिए सोशल सिक्योरिटी स्कीम चलाई जाएंगी।

फिक्स्ड-टर्म कर्मचारियों को भी अब ग्रेच्युटी मिलेगी। उन्हें पांच साल पूरे करने का इंतजार नहीं करना पड़ेगा, बल्कि काम के हिसाब से प्रो-राटा आधार पर ग्रेच्युटी मिल जाएगी।

अब ‘इंस्पेक्टर-कम-फैसिलिटेटर’ सिस्टम लागू होगा। यानी अब इंस्पेक्शन रैंडम तरीके से और कंप्यूटर के जरिए होंगे। इससे अधिकारियों द्वारा परेशान करने की गुंजाइश कम होगी।

‘कंपाउंडिंग ऑफ ऑफेंसेस’ के तहत कुछ अपराधों के लिए कोर्ट-कचहरी के चक्कर लगाने की बजाय सीधे जुर्माना भरकर मामला सुलझाया जा सकेगा। इससे अदालतों का बोझ कम होगा।

सभी तरह के लाइसेंस, रजिस्टर और रिटर्न फाइलिंग का काम अब ऑनलाइन हो जाएगा। इससे कंपनियों को बार-बार दफ्तरों के चक्कर नहीं लगाने पड़ेंगे।

अब ‘वन लाइसेंस, वन रजिस्ट्रेशन’ का नियम होगा। यानी अलग-अलग कामों के लिए अलग-अलग रजिस्ट्रेशन की जरूरत नहीं होगी। सब कुछ एक जगह सेंट्रलाइज्ड होगा, जिससे कंपनियों का काम आसान होगा।

सभी कर्मचारियों के लिए, यहां तक कि असंगठित क्षेत्र के मजदूरों के लिए भी, अब अपॉइंटमेंट लेटर लेना अनिवार्य होगा। इससे उनके काम और शर्तों का लिखित प्रमाण रहेगा।

अब महिलाओं को रात की शिफ्ट में काम करने की इजाजत मिल गई है। लेकिन इसके लिए उनकी सहमति और सुरक्षा के पुख्ता इंतजाम जरूरी होंगे।

कॉन्ट्रैक्ट लेबर एक्ट अब उन एस्टैब्लिशमेंट्स (establishments) पर लागू होगा जहां 50 या उससे ज्यादा कॉन्ट्रैक्ट वर्कर काम करते हैं।

फैक्ट्री के लिए थ्रेशोल्ड बढ़ा दिया गया है। पावर वाले मैन्युफैक्चरिंग यूनिट्स के लिए यह 10 से बढ़ाकर 20 वर्कर और बिना पावर वाले यूनिट्स के लिए 20 से बढ़ाकर 40 वर्कर कर दिया गया है।

काम के घंटे हफ्ते में 48 घंटे ही रहेंगे। हालांकि, रोज के काम के घंटे बढ़ाए जा सकते हैं, लेकिन इसके लिए ओवरटाइम का भुगतान दोगुना दर से करना होगा।

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