
जर्नी आफ सिंधीस नाट्य मंचन ने कराया 1947 की त्रासदी का एहसास
रायपुर। पूज्य छग सिंधी महापंचायत के देवेन्द्रनगर स्थित कार्यालय में आयोजित मुख्य पदाधिकारियों की बैठक के उपरांत प्रवक्ता दिनेश अठवानी ने बताया कि जर्नी आॅफ सिंधीस नाट्य मंचन के माध्यम से सिंधी समाज अपनी ऐतिहासिक पीड़ा, विस्थापन और विभाजन के दर्द को एक बार फिर महसूस कर रहा है। अखंड भारत से हिंदू बहुल क्षेत्र सिंध को भारत में शामिल करने का जो आश्वासन तत्कालीन कांग्रेस नेताओं ने दिया था, उस पर समाज ने भरोसा किया और अपना प्रदेश नहीं छोड़ा। लेकिन 1947 का विभाजन हिंदू समुदाय, विशेष रूप से सिंधी समाज के लिए विनाशकारी साबित हुआ।
Thank you for reading this post, don't forget to subscribe!अठवानी ने बताया कि विभाजन के दौरान भयावह हिंसा और अराजकता के बीच सिंधी समाज को अपने घर-आंगन, व्यवसाय और पुश्तैनी जमीनें छोड़कर हिंदू बहुल प्रदेशों में बसना पड़ा। आचार्य जे.बी. कृपलानी, जयरामदास दौलतराम आलिमचंदानी और चोइथराम गिदवानी जैसे वरिष्ठ नेताओं की सलाह पर हजारों सिंधी परिवार भारत के विभिन्न राज्यों में आकर बसे। उन्होंने कहा कि आज का युवा सिंधी समाज 78-80 वर्ष पूर्व की उन त्रासदियों से अनजान है, जिनके दर्द और आंसू हमारे पूर्वजों ने सहे।
भारत आकर भी सिंधी समाज को विस्थापित और परदेसी कहा गया। इस पीड़ा और संघर्ष को जीवंत रूप में प्रस्तुत करने का कार्य जर्नी आॅफ सिंधीस टीम लगातार कर रही है। मुंबई निवासी मोहित सेवानी के नेतृत्व में 25 सदस्यीय दल नाट्य मंचन के जरिए 1947 के विभाजन, पलायन और विस्थापन की वास्तविक तस्वीर लोगों के सामने ला रहा है। जो भी यह मंचन देखता है, वह अपने आंसू रोक नहीं पाता।
सिंधी महापंचायत का कहना है कि इस नाट्य प्रस्तुति का उद्देश्य सिर्फ सिंधी समाज ही नहीं, बल्कि समूचे समाज को यह बताना है कि विस्थापन और परदेस का दर्द क्या होता है, और किस तरह लाखों लोगों ने अपनी पहचान बचाने के लिए संघर्ष किया। बैठक में अध्यक्ष अमर गिदवानी, कार्यकारी अध्यक्ष राजेश वासवानी, इंदर डोडवानी, महामंत्री जीतू बडवानी, युवा विंग के अध्यक्ष महेश आहूजा, राजेश गुरनानी, सुदेश मंध्यान, अमरदास खट्टर, संजय मंधान सहित कई पदाधिकारी उपस्थित रहे।

