सड़क भी, जंगल भी और विकास भी – उरगा-पथलगांव राष्ट्रीय राजमार्ग बता रहा है कि विकास की रफ्तार और प्रकृति की चाल साथ चल सकती है
श्री आलोक कुमार, क्षेत्रीय अधिकारी, एनएचएआई रायपुर

विकास और पर्यावरण को लंबे समय से एक-दूसरे के विरोधी के रूप में देखा जाता रहा है। जब कहीं सड़क बनती है, तो जंगल की चिंता सामने आती है; जब औद्योगिक गतिविधियां बढ़ती हैं, तो पर्यावरणीय संतुलन का सवाल उठता है। लेकिन क्या हर विकास की कीमत प्रकृति को चुकानी ही पड़ेगी? शायद नहीं। जरूरत ऐसी सोच की है, जिसमें विकास की योजना बनाते समय प्रकृति को बाद में याद न किया जाए, बल्कि शुरुआत से ही उसका हिस्सा बनाया जाए।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी इसी विचार को रेखांकित करते हुए कहा है- “Economy और Ecology दोनों एक साथ चल सकती हैं, आगे बढ़ सकती हैं, भारत ने यही रास्ता चुना है।” यह सोच उन परियोजनाओं के लिए विशेष रूप से महत्वपूर्ण है, जहां आधुनिक इंफ्रास्ट्रक्चर और पर्यावरण संरक्षण को साथ लेकर चलना जरूरी है।
रायपुर : युवाओं को उद्योगों की जरूरतों के अनुरूप मिलेगा प्रशिक्षण, रोजगार के खुलेंगे नए अवसर
छत्तीसगढ़ में भारतीय राष्ट्रीय राजमार्ग प्राधिकरण के माध्यम से विकसित किया जा रहा उरगा-पथलगांव राष्ट्रीय राजमार्ग इसी संतुलित सोच का एक महत्वपूर्ण उदाहरण है। करीब 87.5 किलोमीटर लंबा यह चार लेन मार्ग ऐसे भूभाग से गुजरता है, जहां सड़क और जंगल दोनों की अपनी जरूरतें हैं। कोरबा और धरमजयगढ़ के जंगल केवल प्राकृतिक संपदा के कारण महत्वपूर्ण नहीं हैं, बल्कि ये हाथियों के पारंपरिक आवागमन मार्ग भी हैं।

यही कारण है कि इस राजमार्ग की चर्चा केवल इसकी लंबाई, लागत या चार लेन की क्षमता के कारण नहीं होनी चाहिए। इसकी असली कहानी उन पांच लंबे पुलों में है, जिन्हें हाथियों के पारंपरिक रास्तों को ध्यान में रखते हुए विकसित किया गया है।
करतला में 565 मीटर, खड़गांव में 330 मीटर, नरकालो में 210 मीटर, कोटमेर में 120 मीटर और बैगामार में 90 मीटर लंबे पुल बनाए गए हैं। पांचों संरचनाओं की कुल लंबाई करीब 1.3 किलोमीटर है। इनके नीचे पर्याप्त ऊंचाई रखी गई है, ताकि हाथियों के झुंड सड़क यातायात से प्रभावित हुए बिना अपने पारंपरिक रास्तों से गुजर सकें।
इसे केवल ‘हाथी अंडरपास’ कहकर छोड़ देना इस पहल के महत्व को छोटा कर देना होगा। यह दरअसल सड़क निर्माण की उस बदलती सोच का उदाहरण है, जिसमें इंजीनियरिंग का काम केवल वाहनों को एक स्थान से दूसरे स्थान तक पहुंचाना नहीं रह गया है। अब यह भी सोचना पड़ता है कि उसी रास्ते से गुजरने वाले वन्यजीवों के लिए क्या व्यवस्था होगी।

NHAI की इस परियोजना में वन्यजीवों की आवाजाही को ध्यान में रखकर तैयार की गई संरचनाएं इस बात का संकेत देती हैं कि आधुनिक राजमार्ग निर्माण में पर्यावरणीय संवेदनशीलता को परियोजना नियोजन का अभिन्न हिस्सा बनाया जा सकता है। सड़क और जंगल को एक-दूसरे की बाधा मानने के बजाय दोनों के लिए स्थान तैयार करना ही इस दृष्टिकोण की सबसे बड़ी विशेषता है।
हाथियों के लिए यह इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि वे अपने पारंपरिक मार्गों का पीढ़ियों से इस्तेमाल करते रहे हैं। इन रास्तों पर अचानक सड़क या दूसरी बाधा खड़ी हो जाए तो वन्यजीव और मानव दोनों जोखिम में आ सकते हैं। हाथियों का सड़क पर आना दुर्घटना का कारण बन सकता है और दूसरी ओर, उनके रास्ते में लगातार बाधा हाथी-मानव संघर्ष को बढ़ा सकती है।
इसलिए जंगल में बना कोई पुल केवल कंक्रीट की संरचना नहीं है। वह दो दुनियाओं के बीच बनाया गया एक रास्ता भी है—एक तरफ तेज गति से आगे बढ़ता मानव विकास और दूसरी तरफ अपनी गति से चलती प्रकृति।
उरगा-पथलगांव परियोजना की खासियत यह भी है कि पर्यावरण संरक्षण को केवल वन्यजीव मार्ग तक सीमित नहीं रखा गया है। परियोजना में आवश्यक वन एवं पर्यावरण संबंधी मंजूरियों, क्षतिपूरक वनीकरण और पहाड़ी क्षेत्र में अनावश्यक कटाई को कम रखने जैसे पहलुओं पर भी ध्यान दिया गया है।
यहां एक और बात महत्वपूर्ण है। पर्यावरण संरक्षण का अर्थ विकास रोक देना नहीं है। यदि हर सड़क, पुल या औद्योगिक परियोजना को केवल इसलिए रोक दिया जाए कि वह जंगल से गुजरती है, तो देश की कनेक्टिविटी और आर्थिक गतिविधियों पर भी असर पड़ेगा। दूसरी ओर, यदि विकास के नाम पर प्रकृति की अनदेखी की जाए, तो उसकी कीमत आने वाली पीढ़ियों को चुकानी पड़ सकती है। असली रास्ता इन दोनों अतियों के बीच है।
प्रधानमंत्री का यह विचार कि “विकास और पर्यावरण में संतुलन हमारी पुरातन परंपरा का एक अहम हिस्सा है”, इसी संदर्भ में महत्वपूर्ण हो जाता है। भारत की परंपरा में प्रकृति को संसाधन भर नहीं, जीवन का हिस्सा माना गया है। आधुनिक भारत के सामने चुनौती यह है कि इस सोच को आधुनिक इंफ्रास्ट्रक्चर और तकनीक के साथ कैसे जोड़ा जाए।

श्री आलोक कुमार, क्षेत्रीय अधिकारी, एनएचएआई रायपुर
उरगा-पथलगांव का अनुभव बताता है कि इसका एक रास्ता संभव है। सड़क बने, लेकिन वन्यजीवों का रास्ता भी बना रहे। यातायात तेज हो, लेकिन हाथियों की आवाजाही बाधित न हो। आर्थिक गतिविधियां बढ़ें, लेकिन स्थानीय पर्यावरण पर अनावश्यक दबाव न पड़े।
इस राजमार्ग का आर्थिक महत्व भी कम नहीं है। यह कोरबा, रायगढ़ और जशपुर जैसे क्षेत्रों को बेहतर कनेक्टिविटी देने के साथ रायपुर, झारखंड और ओडिशा से संपर्क मजबूत करने में मदद कर सकता है। कोयला और बिजली क्षेत्र से जुड़े भारी यातायात को बेहतर मार्ग मिलने से स्थानीय सड़कों पर दबाव कम होने की उम्मीद है। यानी यह सड़क आर्थिक गतिविधियों को गति देने के साथ लोगों की रोजमर्रा की आवाजाही को भी आसान बना सकती है।
लेकिन किसी भी बड़ी परियोजना की सफलता केवल उसके निर्माण से तय नहीं होती। उसके बाद उसका रखरखाव और उपयोग भी उतना ही महत्वपूर्ण है। हाथी-पारगमन मार्गों के आसपास वाहनों को अनावश्यक रूप से रोकना, कचरा फेंकना या वन्यजीवों को देखने के लिए भीड़ लगाना इन संरचनाओं के उद्देश्य को कमजोर कर सकता है। इसलिए स्थानीय समुदाय, वाहन चालक, वन विभाग और संबंधित एजेंसियों की सामूहिक जिम्मेदारी बनती है कि इन मार्गों को सुरक्षित और निर्बाध रखा जाए।
आखिरकार, विकास का अर्थ केवल यह नहीं कि हम कितनी तेजी से आगे बढ़े। यह भी महत्वपूर्ण है कि आगे बढ़ते समय हमने पीछे क्या छोड़ा। यदि सड़क लोगों को जोड़ती है, अर्थव्यवस्था को गति देती है और साथ ही जंगल के जीवों के लिए उनके पुराने रास्ते सुरक्षित रखती है, तो यही विकास का अधिक संतुलित रूप है।
रायपुर : युवाओं को उद्योगों की जरूरतों के अनुरूप मिलेगा प्रशिक्षण, रोजगार के खुलेंगे नए अवसर
उरगा-पथलगांव राष्ट्रीय राजमार्ग NHAI की उस व्यापक सोच की ओर संकेत करता है, जिसमें बेहतर कनेक्टिविटी के साथ पर्यावरणीय जिम्मेदारी को भी महत्व दिया जाता है। यह केवल 87.5 किलोमीटर लंबी सड़क नहीं है। यह उस सोच की परीक्षा भी है, जिसमें इकोनॉमी और इकोलॉजी को आमने-सामने नहीं, साथ-साथ देखा जाता है।
सड़क अपनी गति से आगे बढ़े और जंगल अपनी चाल से चलता रहे-यही वह संतुलन है, जो विकास को वास्तव में टिकाऊ बनाता है।

