
हवा में माइक्रोप्लास्टिक्स का खतरा? फेफड़ों की सुरक्षा के लिए आयुर्वेद बताता है प्राकृतिक उपाय
फेफड़ों का स्वास्थ्य आंतरिक और बाहरी कारकों के संयोजन पर निर्भर करता है। फेफड़ों के स्वास्थ्य को बनाए रखने के लिए स्वस्थ जीवनशैली आवश्यक है, वहीं वायु गुणवत्ता और आसपास के वातावरण जैसे बाहरी कारक भी हमारे फेफड़ों को प्रभावित करते हैं। हमारे फेफड़ों को नुकसान पहुंचाने वाला एक प्रमुख बाहरी कारक या अदृश्य विष सूक्ष्म प्लास्टिक है। ये हमारे शरीर में कई तरीकों से प्रवेश करते हैं, जैसे कि पीने का पानी, चिप्स और यहां तक कि हमारी दैनिक जीवन की वस्तुएं, जैसे दवाइयां और दूध के पैकेट। सूक्ष्म प्लास्टिक एक बढ़ता हुआ खतरा है।के टिप्स सूक्ष्म प्लास्टिक का खतरा सूक्ष्म प्लास्टिक का अर्थ है पांच मिलीमीटर से छोटे या 10 माइक्रोन से कम आकार के छोटे प्लास्टिक कण, जो सरसों के बीज से भी छोटे होते हैं। ये अब हमारे चारों ओर हर जगह मौजूद हैं। इनके गैर-बायोडिग्रेडेबल होने के कारण, इन्हें पर्यावरण में छोड़े जाने के बाद हटाना असंभव है। बढ़ती चिंता सूक्ष्म प्लास्टिक के हमारे शरीर में प्रवेश करने को लेकर है। एक अध्ययन के अनुसार, एक औसत व्यक्ति प्रतिदिन एक क्रेडिट कार्ड के बराबर इस अदृश्य विष का सेवन करता है। श्वसन संबंधी समस्याओं के साथ-साथ, ये सूक्ष्म प्लास्टिक चयापचय, हृदय स्वास्थ्य, हार्मोन, विभिन्न अंगों, ऊतकों आदि को भी प्रभावित करते हैं।वायरल जब सूक्ष्म प्लास्टिक श्वसन प्रणाली में प्रवेश करते हैं, तो व्यक्ति कई बीमारियों, विशेष रूप से फेफड़ों से संबंधित बीमारियों का शिकार हो जाता है। ये श्वसन तंत्र के कामकाज में बाधा डालते हैं और फाइब्रोसिस, अस्थमा और ब्रोंकाइटिस जैसी बीमारियों का कारण बनते हैं। और यह दीर्घकालिक श्वसन स्वास्थ्य को प्रभावित करता है। यहीं पर दिव्या ब्रोंकोम काम आता है। पतंजलि अनुसंधान संस्थान ने श्वसन स्वास्थ्य के लिए और फेफड़ों में सूक्ष्म प्लास्टिक जैसी समस्याओं से लड़ने के लिए एक प्रभावी दिव्या ब्रोंकोम 60 एन (35 ग्राम) लॉन्च किया है। फेफड़ों तक सूक्ष्म प्लास्टिक के पहुंचने पर 2022 में प्रकाशित एक शोध पत्र ने पतंजलि अनुसंधान संस्थान के वैज्ञानिकों को इस पर काम करने के लिए प्रेरित किया।इस गर्मी में हाइड्रेशन का सबसे बेहतरीन तरीका जब 2023 में शोध शुरू हुआ और एक वर्ष तक गहन अध्ययन किया गया, तो वैज्ञानिकों ने पाया कि आयुर्वेद सूक्ष्म प्लास्टिक के प्रभावों को कम करता है। दिव्या ब्रोंकोम फेफड़ों को शुद्ध और मजबूत करने के लिए विकसित एक आदर्श आयुर्वेदिक औषधि है। दिव्या ब्रोंकोम में लौंग, तुलसी, दालचीनी, सोंठ, मुलेठी, अमलतास, सफेद वासा, बनफसा, भारंगी, मरीच, कपर्दक भस्म और गोदांती भस्म जैसी आवश्यक जड़ी-बूटियाँ शामिल हैं। यह सर्दी और खांसी जैसी श्वसन संबंधी समस्याओं को दूर करता है, ऑक्सीजन प्रवाह बढ़ाकर सांस लेने में सुधार करता है, कफ निकालता है, सूजन कम करता है और फेफड़ों को मजबूत बनाता है।अनुसंधान विधि और वैज्ञानिक महत्व इस अध्ययन में लगभग 88 चूहों को माइक्रोप्लास्टिक कणों के संपर्क में लाया गया और बाद में उन्हें ‘दिव्य ब्रोंकोम’ (Divya Bronchom) दिया गया। श्वसन प्रणाली पर इसके प्रभाव को समझने के लिए, श्वसन क्रियाओं को मापने हेतु ‘फ्लेक्सीवेंट सिस्टम’ (Flexivent System) नामक एक मशीन का उपयोग किया गया। यह पाया गया कि ब्रोंकोम ने उनकी फेफड़ों की कार्यक्षमता को खुराक-निर्भर तरीके से वापस सामान्य स्तर पर ला दिया। यानी, खुराक जितनी अधिक थी, सुधार भी उतना ही बेहतर हुआ। श्वसन मार्ग की सूजन (inflammation) का पता लगाने के लिए, फेफड़ों का द्रव (fluid) एकत्र किया गया। परिणाम यह निकला कि माइक्रोप्लास्टिक्स ने प्रतिरक्षा कोशिकाओं (immune cells) के स्तर को बढ़ा दिया था। लेकिन ब्रोंकोम के उपयोग से ये स्तर खुराक-निर्भर तरीके से कम हो गए। इसके अलावा, ब्रोंकोम के उपयोग से सूजन से संबंधित जीनों (genes) का स्तर भी कम हो गया। फेफड़ों के ऊतकों (tissues) की हिस्टोपैथोलॉजी (ऊतक-विज्ञान) के माध्यम से यह देखा गया कि माइक्रोप्लास्टिक्स से क्षतिग्रस्त हुए श्वसन मार्ग, ब्रोंकोम के उपयोग के बाद सामान्य हो गए। ये सुधार वायु प्रवाह की गति और साँस छोड़ने के दबाव जैसे मापदंडों में देखे गए। मानव परीक्षणों में भी सुधार देखा गया। THP-1 कोशिकाओं पर किए गए एक प्रयोग में, खुराक-निर्भर प्रभावशीलता के माध्यम से सकारात्मक परिणाम देखे गए। माइक्रोप्लास्टिक्स से लड़ने के लिए 3 आयुर्वेदिक सुझाव जड़ी-बूटियाँ: तुलसी श्वसन संक्रमण से लड़ने, फेफड़ों की कार्यक्षमता को बढ़ाने और सूजन व अन्य समस्याओं से बचाने के लिए बहुत उत्तम है। मुलेठी श्वसन मार्गों को चिकना बनाती है और जमे हुए बलगम (mucus) की समस्याओं से लड़ती है। अश्वगंधा तनाव को कम करती है और प्रदूषकों से होने वाली सूजन से लड़ती है। चिकित्सा पद्धतियाँ (Therapies): नासिका चिकित्सा (Nasal therapy)—जैसे कि ‘नेजल ऑयल पुलिंग’, ‘जल नेति’ और ‘ऑयल पुलिंग’—शरीर में माइक्रोप्लास्टिक्स जैसे प्रदूषकों के प्रवेश के विरुद्ध एक अवरोधक (barrier) का काम करती है; यह उन्हें शरीर की प्रणाली से बाहर निकालती है और विषाक्त पदार्थों को दूर करती है। आहार: श्वसन मार्ग को हाइड्रेटेड (नम) रखने के लिए गर्म पानी और हर्बल काढ़ों का सेवन करें। एक या दो चम्मच घी श्वसन मार्गों को चिकनाई प्रदान करता है और जलन को शांत करता है। हल्दी, लहसुन और काली मिर्च जैसे मसालों को अपनी डाइट में शामिल करें; ये प्रतिरक्षा (immunity) बढ़ाने वाले और सूजन कम करने वाले तत्व हैं।
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