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बिखौती को क्यों कहा जाता है ‘बुढ़ त्यार’? पढ़िए इस परंपरा की दिलचस्प मान्यता

उत्तराखंड : उत्तराखंड के कुमाऊं इलाके में आज बिखौती का त्योहार मनाया जा रहा है, जिसे लोग प्यार से ‘बुढ़ त्यार’ भी कहते हैं। ये त्योहार हर साल चैत्र महीने की आखिरी तारीख को और बैसाख की शुरुआत पर मनाया जाता है। खेतों में नई फसल आने, नए साल की शुरुआत और सूर्य के विषुवत संक्रांति में आने की वजह से ये पर्व और भी खास हो जाता है। बिखौती क्यों मनाई जाती है? जब चैत्र महीने की आखिरी तारीख होती है और बैसाख शुरू होता है, तब खेतों की नई फसलें तैयार होती हैं। इसी वक्त सूर्य विषुवत रेखा पर होता है, यानी दिन और रात बराबर होते हैं। इस मौके पर बिखौती मनाई जाती है। इसे ‘बुढ़ त्यार’ इसलिए भी कहा जाता है क्योंकि सूर्य के उत्तरायण में ये आखिरी बड़ा पर्व होता है। बिखौती कैसे मनाते हैं? इस दिन लोग खेत की नई फसलों को लोक देवताओं को अर्पण करते हैं। इसके बाद परिवार के पुजारी घर आकर ‘संवत्सर’ सुनाते हैं, यानी पूरे साल का राशिफल बताते हैं। कुछ इलाकों में इसी दिन हरेला बोया जाता है। एक खास परंपरा के तहत बुजुर्ग गर्म की गई लोहे की छड़ को बच्चों के शरीर पर हल्के से लगाते हैं, जिसे ‘ताव लगाना’ कहते हैं। मान्यता है कि इससे बच्चे सेहतमंद रहते हैं और बीमारियां दूर रहती हैं। स्याल्दे बिखौती मेला और ‘ओढ़ा’ की परंपरा पाली पछाऊं इलाके में बिखौती का असली रंग तब दिखता है जब विभांडेश्वर मंदिर से मेला शुरू होता है। इस दौरान ढोल-दमाऊ और चिमटे की थाप पर लोग एक-दूसरे का हाथ थामकर कदम से कदम मिलाकर कुमाऊं के पारंपरिक गीतों पर नाचते हैं। इस मेले की सबसे खास बात होती है ‘ओढ़ा’ की रस्म।

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कहानी है कि एक बार दो गांवों के लोग जब शीतलादेवी मंदिर से पूजा कर लौट रहे थे, तब उनके बीच झगड़ा हो गया और एक दल के मुखिया का सिर काट दिया गया। जहां उसका सिर गाड़ा गया, वहां एक पत्थर रख दिया गया, जो अब ‘ओढ़ा’ कहलाता है। उसी पत्थर पर प्रतीक रूप से वार करके लोग आगे बढ़ते हैं। इस परंपरा में आल, नज्यूला और खरक गांव हिस्सा लेते हैं। पहले यहां देवीधुरा की तरह पाषाण युद्ध (बग्वाल) भी होता था, लेकिन अब सिर्फ ओढ़ा की रस्म ही रह गई है। क्यों कहते हैं इसे ‘बुढ़ त्यार’? मान्यता है कि सूर्य के उत्तरायण यानी उत्तर दिशा की ओर रहने के समय ये आखिरी त्योहार होता है। इसके बाद लगभग तीन महीने तक कोई खास पर्व नहीं आता, फिर जुलाई में हरेला मनाया जाता है, लेकिन तब तक सूर्य दक्षिणायन हो जाता है। इसीलिए इसे ‘बुढ़ त्यार’ कहा जाता है – यानी पुराने समय का आखिरी त्योहार। समय के साथ अब ये मेला अपने पुराने रंग-रूप को थोड़ा खो रहा है। पहले ये न सिर्फ संस्कृति का उत्सव था, बल्कि व्यापार का भी बड़ा केंद्र हुआ करता था। आज ये मेला कुमाऊं के लोक गीतों, कहानियों और परंपराओं में ही ज़्यादा जिंदा है।

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