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बोर्डिंग स्कूल्स पर विशेष सत्र में मिथकों का खंडन, तथ्यों की पड़ताल और अभिभावकों की जिज्ञासा का समाधान

जतिन नचरानी

रायपुर। बोर्डिंग स्कूल्स के मिथकों, तथ्यों और बच्चों की तैयारी को लेकर राधिका खंडेलवाल द्वारा आयोजित एक विशेष सत्र का रायपुर में आयोजन किया गया। इस सत्र में शिक्षा और मनोविज्ञान के क्षेत्र के प्रख्यात विशेषज्ञों ने भाग लिया और अभिभावकों को बोर्डिंग स्कूलों से जुड़े विभिन्न पहलुओं पर मार्गदर्शन प्रदान किया। कार्यक्रम का संचालन राधिका खंडेलवाल और निधि डागा ने किया। सत्र में वक्ताओं के रूप में काउंसलिंग साइकोलॉजिस्ट डॉ. इला गुप्ता, देहरादून डिफेंस अकादमी के चेयरमैन हिमांशु गोयल और ट्रूमैथ्स के संस्थापक समक्ष गोयल शामिल रहे। इस अवसर पर अभिभावकों ने बोर्डिंग स्कूलों से जुड़े सवालों के जवाब प्राप्त किए और विशेषज्ञों के अनुभवों से लाभान्वित हुए।

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सत्र की शुरुआत एक मूलभूत सवाल से हुई: बच्चों के लिए क्या बेहतर है—

बोर्डिंग स्कूल का अनुशासित माहौल या घर का भावनात्मक सुकून? डॉ. इला गुप्ता ने इस पर प्रकाश डालते हुए कहा कि हर बच्चा अद्वितीय है और उसकी आवश्यकताएं अलग होती हैं। कुछ बच्चों के लिए बोर्डिंग स्कूल आत्मनिर्भरता और आत्मविश्वास को बढ़ावा देता है, जबकि अन्य बच्चों को परिवार का सहारा और घर का माहौल अधिक लाभकारी होता है। उन्होंने अभिभावकों को सलाह दी कि वे अपने बच्चे की मानसिक और भावनात्मक स्थिति को समझकर ही निर्णय लें। हिमांशु गोयल ने बोर्डिंग स्कूलों के लाभों पर जोर देते हुए कहा कि ये स्कूल बच्चों को समय प्रबंधन, अनुशासन और संगठित जीवनशैली सिखाते हैं। उन्होंने बताया कि बोर्डिंग स्कूलों का वातावरण बच्चों को जीवन के विभिन्न क्षेत्रों में मजबूत बनाता है। हालांकि, उन्होंने यह भी स्वीकार किया कि माता-पिता की उपस्थिति और घर का स्नेह बच्चों को मानसिक स्थिरता प्रदान करता है। समक्ष गोयल ने देश के प्रमुख बोर्डिंग स्कूलों की विशेषताओं पर प्रकाश डाला और सुझाव दिया कि स्कूल का चयन केवल नाम के आधार पर नहीं, बल्कि बच्चे की रुचियों, व्यक्तित्व और भविष्य की आकांक्षाओं के अनुरूप करना चाहिए। डॉ. इला गुप्ता ने बोर्डिंग स्कूलों के मनोवैज्ञानिक पहलुओं पर विस्तार से चर्चा की।

उन्होंने बताया कि शुरुआती दौर में कई बच्चे होमसिकनेस का सामना करते हैं और अनुशासित माहौल का दबाव उन्हें तनावग्रस्त कर सकता है। हालांकि, कई बच्चे इस वातावरण में जल्दी ढलकर आत्मनिर्भर और आत्मविश्वासी बन जाते हैं। उन्होंने अभिभावकों को सलाह दी कि वे बच्चों के साथ-साथ स्वयं को भी इस बदलाव के लिए मानसिक रूप से तैयार करें। सत्र का एक रोचक हिस्सा बोर्डिंग स्कूलों से जुड़े मिथकों का खंडन रहा। वक्ताओं ने स्पष्ट किया कि यह धारणा गलत है कि बोर्डिंग स्कूल बच्चों को परिवार से दूर करते हैं या केवल कमजोर बच्चों के लिए उपयुक्त हैं। उन्होंने बताया कि आधुनिक बोर्डिंग स्कूल न केवल शिक्षा, बल्कि खेल, नेतृत्व क्षमता और अन्य गतिविधियों पर भी ध्यान केंद्रित करते हैं, जिससे बच्चों का सर्वांगीण विकास होता है। कार्यक्रम में बड़ी संख्या में अभिभावकों ने भाग लिया और अपने सवालों के जवाब प्राप्त किए। विशेषज्ञों ने उदाहरणों के माध्यम से समझाया कि बोर्डिंग स्कूल सही माहौल में बच्चों के जीवन में सकारात्मक बदलाव ला सकते हैं। सत्र के अंत में यह निष्कर्ष निकला कि बोर्डिंग स्कूल का चयन सोच-समझकर करना चाहिए। यह निर्णय बच्चे की रुचि, मानसिक तैयारी और भविष्य की जरूरतों को ध्यान में रखकर लिया जाना चाहिए।

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