
भारत-अमेरिका व्यापार: टैक्स की मार, वार्ताओं का दौर और आगे क्या?
Thank you for reading this post, don't forget to subscribe!अमेरिका का टैक्स का हथौड़ा: भारतीय निर्यात पर भारी बोझ-दोस्तों, हाल ही में अमेरिका ने भारत के निर्यात पर जो टैक्स लगाए हैं, उसने दोनों देशों के व्यापारिक रिश्तों में थोड़ी खटास ला दी है। पहले तो अमेरिका ने भारत से आने वाले सामानों पर 25% का टैक्स लगाया, और फिर रूस से तेल खरीदने की वजह से एक और 25% का जुर्माना ठोक दिया। अब सोचिए, कई भारतीय सामानों पर तो सीधा 50% तक का टैक्स लग रहा है! इसका सीधा असर ये हुआ कि जुलाई में जहाँ भारत से अमेरिका को 8.01 अरब डॉलर का निर्यात हुआ था, वहीं अगस्त में ये घटकर 6.86 अरब डॉलर रह गया। ये आंकड़े साफ बताते हैं कि भारतीय निर्यातकों को कितनी मुश्किलों का सामना करना पड़ रहा है। भारत ने इन टैक्सों को बिल्कुल गलत और अनुचित बताया है, वहीं अमेरिका का कहना है कि भारत भी अपने यहां दूसरे देशों के सामानों पर ऊंचे टैक्स लगाता है और रूस से तेल खरीदकर अमेरिका की नीतियों को चुनौती दे रहा है। ये स्थिति दोनों देशों के लिए थोड़ी पेचीदा है। भारत को निर्यात में घाटा हो रहा है, जबकि अमेरिका अपने किसानों और व्यापारियों के लिए भारतीय बाज़ार खोलना चाहता है। इसीलिए, अब जो बातचीत होने वाली है, वो दोनों देशों के लिए बहुत मायने रखती है।
बातचीत में फंसे पेंच: टैक्स से लेकर खेती तक के मुद्दे-इस बार की बातचीत कई नाजुक मुद्दों पर अटकी हुई है। सबसे बड़ा मुद्दा तो यही अमेरिकी टैक्स है। भारत ज़ाहिर तौर पर चाहेगा कि अमेरिका ये 50% वाला टैक्स कम करे या पूरी तरह से हटा दे। भारत का कहना है कि रूस से तेल खरीदना उनकी अपनी ऊर्जा सुरक्षा का मामला है और इसे व्यापार से जोड़ना ठीक नहीं है। दूसरी तरफ, अमेरिका चाहेगा कि भारत रूस पर अपनी निर्भरता कम करे और इस बात का भरोसा दे। साथ ही, अमेरिका ये भी चाहता है कि भारत अपनी उन नीतियों में थोड़ी नरमी लाए जिनसे अमेरिकी निर्यातकों को परेशानी होती है। इसके अलावा, कृषि और डेयरी का क्षेत्र भी एक बड़ा विवाद बन सकता है। भारत में ये क्षेत्र करोड़ों छोटे किसानों और आम लोगों की ज़िंदगी से जुड़े हैं। वहीं, अमेरिका चाहता है कि उनके डेयरी उत्पाद, मक्का और जेनेटिकली मॉडिफाइड (GM) फूड्स को भारतीय बाज़ार में आसानी से जगह मिले। तो आप देख सकते हैं कि दोनों पक्ष अपनी-अपनी बात पर अड़े हुए हैं, और जब तक कोई बीच का रास्ता नहीं निकलता, तब तक समझौता मुश्किल है।
नियम-कानून और अंदरूनी दबाव: व्यापार के पीछे की राजनीति-सिर्फ टैक्स ही नहीं, बल्कि कुछ नियम-कानून भी इस विवाद की जड़ हैं। भारत चाहता है कि वो अपने स्वास्थ्य, सुरक्षा और पर्यावरण से जुड़े नियम खुद तय करे। साथ ही, वो अपने छोटे और मध्यम उद्योगों (MSME) को भी बचाना चाहता है, क्योंकि ये बड़े विदेशी ब्रांडों के सामने टिक नहीं पाएंगे। वहीं, अमेरिका का मानना है कि भारत के नियम-कानून उतने पारदर्शी नहीं हैं और वे अचानक बदल जाते हैं। अमेरिकी कंपनियों का कहना है कि भारत के नियम और परमिट सिस्टम उनके व्यापार को नुकसान पहुंचाते हैं। इसके अलावा, दोनों देशों की अपनी-अपनी राजनीति भी इसमें अहम भूमिका निभा रही है। भारत में किसान और डेयरी सेक्टर के लोग अगर नाराज़ हो गए, तो सरकार के लिए बड़ी मुश्किल खड़ी हो सकती है। इसी तरह, अमेरिका में भी किसानों का समूह बहुत प्रभावशाली है और वे चाहते हैं कि भारत उनका बाज़ार खोले। तो कुल मिलाकर, ये सिर्फ व्यापार की बात नहीं, बल्कि राजनीति और अंदरूनी दबावों का भी खेल है।
क्या इस बार कुछ बदलेगा? उम्मीदें और चुनौतियाँ-पिछली बार जब भी भारत और अमेरिका के बीच व्यापार को लेकर बातचीत हुई है, तो नतीजे हमेशा अधूरे ही रहे हैं। लेकिन इस बार हालात थोड़े अलग लग रहे हैं। भारत पर निर्यात घटने का दबाव है, और अमेरिका भी अपनी वैश्विक रणनीति के चलते भारत के साथ रिश्ते सुधारना चाहता है। प्रधानमंत्री मोदी और अमेरिकी राष्ट्रपति के बीच हाल ही में हुई अच्छी बातचीत से माहौल थोड़ा सकारात्मक हुआ है। भारत ने भी संकेत दिए हैं कि नवंबर तक कोई छोटा-मोटा समझौता हो सकता है, जिसे ‘पहले चरण’ का समझौता कहा जा रहा है। इससे थोड़ी राहत मिल सकती है और आगे की बातचीत का रास्ता खुल सकता है। लेकिन मुश्किलें भी कम नहीं हैं। अगर अमेरिका रूस वाले मुद्दे पर ज्यादा दबाव बनाता है, या भारत अपने किसानों की सुरक्षा को दांव पर लगाकर कोई समझौता करता है, तो दोनों देशों में राजनीतिक विरोध बढ़ सकता है। इसलिए, इस बार दोनों देशों को बहुत ही सोच-समझकर और संतुलन बनाकर आगे बढ़ना होगा।
आगे क्या हो सकता है? संभावित नतीजे और राह-सबसे अच्छा तो यही होगा कि अमेरिका कुछ हद तक अपने टैक्स कम कर दे और भारत भी कृषि और नियमों के मामले में थोड़ी नरमी दिखाए। साथ ही, दोनों देश मिलकर कुछ ऐसे नियम बनाएं जिनसे व्यापार आसान हो। एक और संभावना यह भी है कि अमेरिका सारे टैक्स एकदम से हटा दे या भारत अपना पूरा कृषि बाज़ार खोल दे, लेकिन ये दोनों ही कदम राजनीतिक रूप से बहुत मुश्किल हैं। आने वाले दिनों में यह देखना होगा कि दोनों देशों के अधिकारी क्या कहते हैं। अगर नवंबर तक कोई ‘पहले चरण’ का समझौता हो जाता है, तो इसे एक अच्छी शुरुआत माना जाएगा। लंबे समय में, यह समझौता सिर्फ व्यापार ही नहीं, बल्कि दोनों देशों के राजनीतिक और रणनीतिक रिश्तों को भी प्रभावित करेगा। अगर दोनों देश सही संतुलन बना पाए, तो यह साझेदारी भारत और अमेरिका दोनों के लिए बहुत फायदेमंद साबित हो सकती है।

