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H-1B वीजा पर अमेरिका का बड़ा फैसला: कांग्रेस का मोदी सरकार पर वार, कहा– ‘कमजोर प्रधानमंत्री’

अमेरिका का नया H-1B वीजा नियम: भारतीय आईटी सेक्टर पर गहराता संकट

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अमेरिकी वीजा नियमों में बड़ा बदलाव: भारतीय आईटी पेशेवरों के लिए नई चुनौती-हाल ही में अमेरिका ने H-1B वीजा के नियमों में एक बड़ा और अप्रत्याशित बदलाव किया है, जिसने भारतीय आईटी सेक्टर में चिंता की लहर दौड़ा दी है। इस नए नियम के तहत, H-1B वीजा पर अमेरिका जाने वाले पेशेवरों को अब सालाना 1 लाख डॉलर, यानी लगभग 83 लाख रुपये की भारी-भरकम फीस चुकानी पड़ेगी। यह फैसला विशेष रूप से भारत के लिए महत्वपूर्ण है क्योंकि H-1B वीजा पर अमेरिका में काम करने वाले लोगों में 70% से अधिक भारतीय नागरिक हैं। इस नियम का सीधा असर भारत की प्रमुख आईटी कंपनियों पर पड़ेगा, खासकर उन कंपनियों पर जो बेंगलुरु, हैदराबाद और पुणे जैसे शहरों में स्थित हैं। इस कदम को लेकर भारत में राजनीतिक सरगर्मी भी तेज हो गई है, जहाँ कांग्रेस ने इसे मोदी सरकार की विदेश नीति की विफलता करार दिया है। पार्टी का कहना है कि सरकार ने अपने प्रचार और व्यक्तिगत छवि पर अधिक ध्यान केंद्रित किया है, जबकि देश के युवाओं और महत्वपूर्ण आईटी क्षेत्र के हितों की रक्षा के लिए कोई ठोस कदम नहीं उठाए गए हैं। यह स्थिति भारतीय पेशेवरों के लिए अमेरिका में करियर बनाने की राह को और अधिक कठिन बना सकती है।

 कांग्रेस का तीखा प्रहार: ‘कमजोर नेतृत्व और खोखली विदेश नीति’ का आरोप-कांग्रेस पार्टी ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पर तीखा हमला बोलते हुए उन्हें ‘कमजोर प्रधानमंत्री’ बताया है। पार्टी अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे ने आरोप लगाया कि विदेश नीति केवल बड़े-बड़े आयोजनों और दिखावे का नाम नहीं है, बल्कि इसका असली उद्देश्य देश के राष्ट्रीय हितों की रक्षा करना और भारत को सर्वोपरि रखना है। खड़गे ने व्यंग्यात्मक लहजे में कहा कि केवल गले मिलना, नारे लगाना और लोगों से ‘मोदी-मोदी’ के नारे लगवाकर विदेश नीति नहीं चलाई जा सकती। उन्होंने यह भी कहा कि अमेरिका से भारत को ‘जन्मदिन का तोहफा’ मिला है, जिसमें H-1B वीजा पर भारी फीस वृद्धि, 50% तक टैरिफ बढ़ाना और अरबों डॉलर का आर्थिक नुकसान शामिल है। कांग्रेस का मानना है कि सरकार की चुप्पी और रणनीतिक कमजोरी के कारण भारत का भविष्य खतरे में पड़ रहा है। यह आरोप इस बात पर जोर देते हैं कि सरकार को अपनी विदेश नीति पर गंभीरता से पुनर्विचार करने की आवश्यकता है, ताकि भारतीय नागरिकों और व्यवसायों के हितों की रक्षा हो सके।

 राहुल गांधी का सीधा निशाना: ‘भारत का प्रधानमंत्री कमजोर है’-विपक्ष के नेता राहुल गांधी ने भी इस मुद्दे पर प्रधानमंत्री पर सीधा प्रहार किया है। उन्होंने सोशल मीडिया पर अपनी बात रखते हुए कहा, “मैं बार-बार कहता हूं, भारत के पास एक कमजोर प्रधानमंत्री है।” राहुल गांधी का मानना है कि अमेरिकी सरकार के इस फैसले से भारतीय युवाओं और देश के आईटी क्षेत्र को सबसे ज्यादा नुकसान होगा। उन्होंने 2017 में हुई प्रधानमंत्री मोदी और तत्कालीन अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की मुलाकात का भी जिक्र किया, जब H-1B वीजा जैसे महत्वपूर्ण मुद्दे को शायद उठाया ही नहीं गया था। राहुल गांधी के अनुसार, यह घटनाक्रम दर्शाता है कि मोदी सरकार भारतीयों के वास्तविक मुद्दों पर बातचीत करने से कतराती है और केवल सतही राजनीति में विश्वास रखती है। यह आलोचना इस बात को रेखांकित करती है कि कैसे महत्वपूर्ण राष्ट्रीय मुद्दों को प्राथमिकता नहीं दी जा रही है, जिससे देश के नागरिकों को भविष्य में कठिनाइयों का सामना करना पड़ सकता है।

 गौरव गोगोई और अन्य नेताओं की चिंता: ‘रणनीतिक चुप्पी का खामियाजा’-कांग्रेस के वरिष्ठ नेता गौरव गोगोई ने इस नए नियम को अमेरिका के इरादों का स्पष्ट संकेत बताया है, जो भारतीय प्रतिभाओं के भविष्य पर सीधा प्रहार कर रहा है। उन्होंने प्रधानमंत्री मोदी की ‘रणनीतिक चुप्पी और दिखावटी राजनीति’ की कड़ी आलोचना करते हुए कहा कि यह अब देश के लिए एक बड़ा बोझ बन गई है। इसी कड़ी में, कांग्रेस प्रवक्ता पवन खेड़ा ने याद दिलाया कि राहुल गांधी ने 2017 में ही इस बात की चेतावनी दी थी कि मोदी सरकार H-1B वीजा के मुद्दे को गंभीरता से नहीं ले रही है, और आज वही सच साबित हो रहा है। कांग्रेस के कई नेताओं ने सामूहिक रूप से इस फैसले को मोदी सरकार की विदेश नीति की एक बड़ी असफलता के रूप में प्रस्तुत किया है। यह स्थिति दर्शाती है कि कैसे महत्वपूर्ण समय पर सही निर्णय न लेने का परिणाम देश के नागरिकों को भुगतना पड़ सकता है, खासकर जब बात अंतरराष्ट्रीय संबंधों और आर्थिक अवसरों की हो।

 ट्रंप प्रशासन का बचाव: ‘H-1B वीजा का दुरुपयोग और राष्ट्रीय सुरक्षा’-पूर्व अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने H-1B वीजा फीस में वृद्धि को उचित ठहराते हुए कहा था कि इस वीजा का काफी दुरुपयोग हो रहा है। उनके अनुसार, H-1B प्रोग्राम अमेरिकी नागरिकों के लिए उपलब्ध नौकरियों को छीन रहा है और इसे राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए भी एक खतरा माना गया है। ट्रंप का यह भी दावा था कि कई कंपनियां इस वीजा का इस्तेमाल कम वेतन पर अकुशल विदेशी कर्मचारियों को नियुक्त करने के लिए करती हैं, जिससे अमेरिकी श्रमिकों को नुकसान होता है। इसी तर्क के आधार पर, उन्होंने वीजा फीस को 1 लाख डॉलर तक बढ़ाने और कुछ गैर-आप्रवासी कर्मचारियों के अमेरिका में प्रवेश पर प्रतिबंध लगाने की घोषणा की थी। यह तर्क अमेरिकी दृष्टिकोण को दर्शाता है, जहाँ वे अपने घरेलू श्रमिकों और राष्ट्रीय हितों को प्राथमिकता देने का दावा करते हैं।

 भारत के लिए बढ़ती चुनौतियाँ और भविष्य की अनिश्चितता-अमेरिका के इस नए H-1B वीजा नियम ने भारत के आईटी सेक्टर और लाखों युवाओं के भविष्य को लेकर गंभीर चिंताएं बढ़ा दी हैं। पहले से ही, भारतीय कंपनियों को अमेरिका में टैरिफ और आउटसोर्सिंग पर लगे प्रतिबंधों जैसी कई बाधाओं का सामना करना पड़ रहा था। अब H-1B वीजा फीस में यह भारी वृद्धि, भारतीय इंजीनियरों और आईटी पेशेवरों के लिए अमेरिका में नौकरी करना और भी अधिक महंगा और कठिन बना देगी। कांग्रेस का कहना है कि मोदी सरकार को अब केवल दिखावे से बाहर निकलकर वास्तविक और ठोस कदम उठाने की आवश्यकता है। यह मामला केवल विदेश नीति का नहीं है, बल्कि यह लाखों भारतीय परिवारों के भविष्य और उनकी आर्थिक सुरक्षा से जुड़ा एक अत्यंत महत्वपूर्ण सवाल है। सरकार को इस संकट से निपटने के लिए एक प्रभावी रणनीति बनानी होगी।

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