छत्तीसगढ़

प्राकृतिक खेती से कृषक मनभौतिन बाई एवं माखन निषाद को मिला भरपूर लाभ

रायपुर। प्रदेश के किसानों का रुझान अब तेजी से जैविक एवं प्राकृतिक खेती की ओर बढ़ रहा है। राष्ट्रीय प्राकृतिक खेती मिशन के अंतर्गत किसानों को रसायन मुक्त खेती के लिए निरंतर प्रोत्साहित किया जा रहा है, जिससे न केवल खेती की लागत कम हो रही है, बल्कि किसानों की आय में भी
उल्लेखनीय वृद्धि हो रही है। वर्तमान में कृषक दंपत्ति वर्ष 2025-26 रबी सीजन में सब्जियों के साथ-साथ तिवड़ा, मसूर एवं सरसों की खेती भी प्राकृतिक पद्धति से कर रहे हैं। राष्ट्रीय प्राकृतिक खेती मिशन के तहत वर्ष 2025 में राजनांदगांव विकासखंड के अंतर्गत 150 हेक्टेयर क्षेत्र में क्लस्टर तैयार कर किसानों को प्राकृतिक खेती अपनाने के लिए प्रेरित किया गया

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मिशन के अंतर्गत ग्राम मोखला के प्रगति महिला स्वसहायता समूह के कृषकों को जीवामृत, बीजामृत, घनजीवामृत, दशपर्णी अर्क सहित अन्य प्राकृतिक उत्पाद तैयार करने तथा फसलों की अवस्था के अनुसार उनके उपयोग का प्रशिक्षण प्रदान किया गया।
इस प्रशिक्षण कार्यक्रम के अंतर्गत ग्राम मोखला निवासी 68 वर्षीय कृषक श्रीमती मनभौतिन बाई निषाद एवं उनके 72 वर्षीय पति श्री माखन निषाद ने प्राकृतिक खेती का प्रशिक्षण प्राप्त किया।

जैविक खेती की ओर बढ़ा रहा है किसानों का रुझान : प्राकृतिक खेती से कृषक श्रीमती मनभौतिन बाई निषाद एवं श्री माखन निषाद को मिला भरपूर लाभ

शिवनाथ नदी तट पर निवास करने वाले इस कृषक दंपत्ति के पास स्वयं की 1.17 एकड़ तथा 1.17 एकड़ लीज भूमि सहित कुल 2.34 एकड़ कृषि भूमि है, जिस पर वे पूर्व में धान एवं उद्यानिकी फसलों की खेती कर रहे थे। रासायनिक खेती के माध्यम से उन्हें प्रतिवर्ष लगभग 50 से 60 हजार रुपये की आय होती थी।
श्रीमती मनभौतिन बाई निषाद ने बताया कि उद्यानिकी फसलों में लगातार रासायनिक उर्वरकों एवं कीटनाशकों के उपयोग से न केवल लागत बढ़ रही थी, बल्कि उत्पादों के सेवन से लोगों के बीमार होने की घटनाएं भी सामने आ रही थीं। इससे प्रेरित होकर उन्होंने रसायन मुक्त खेती अपनाने का निर्णय लिया और प्राकृतिक कृषि पद्धति से खेती की शुरुआत की। प्रारंभ में जानकारी के अभाव, उत्पादन कम होने और कीट-बीमारियों के डर जैसी चुनौतियों का सामना करना पड़ा।
प्रशिक्षण प्राप्त करने के बाद उनकी रासायनिक खाद एवं कीटनाशकों पर निर्भरता समाप्त हो गई। उन्होंने बताया कि रासायनिक खेती में प्रति एकड़ 20 से 22 हजार रुपये तक का खर्च आता था, जबकि प्राकृतिक खेती में जीवामृत, घनजीवामृत, नीमास्त्र आदि तैयार करने में केवल बेसन, गुड़, मट्ठा जैसी घरेलू सामग्री की आवश्यकता होती है। देशी गाय का गोबर एवं गौमूत्र, मिट्टी और विभिन्न प्रकार के पत्ते गांव में आसानी से उपलब्ध हो जाते हैं, जिससे लागत अत्यंत कम हो गई है।
प्राकृतिक खेती के परिणामस्वरूप खेतों में लाभदायक केचुओं एवं सूक्ष्म जीवों की संख्या में वृद्धि हुई है, जिससे मिट्टी की उर्वरता बढ़ी है। प्राकृतिक उत्पादों के उपयोग से फसलों की गुणवत्ता बेहतर हुई है और जहर मुक्त उत्पादों को बाजार में अच्छी कीमत मिल रही है। व्यापारियों द्वारा सीधे खेत से उत्पाद खरीदे जाने लगे हैं, जिससे कृषक दंपत्ति की आय में वृद्धि हुई है और वे आर्थिक रूप से सशक्त हो रहे हैं। श्रीमती मनभौतिन बाई निषाद आज जिले के किसानों के लिए प्रेरणा का स्रोत बन चुकी हैं और उन्हें विभिन्न जिला स्तरीय कार्यक्रमों में सम्मानित भी किया गया है।

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