अंतरराष्ट्रीय वन दिवस पर शनिवार को देहरादून स्थित वन अनुसंधान संस्थान में आयोजित दो दिवसीय राष्ट्रीय कार्यशाला के उद्घाटन के दौरान उन्होंने यह बात कही। ‘वन-आधारित सतत जैव-अर्थव्यवस्था को बढ़ावा देना: मुद्दे और चुनौतियां’ विषय पर यह कार्यशाला 21-22 मार्च को भारतीय वानिकी अनुसंधान एवं शिक्षा परिषद (आईसीएफआरई) द्वारा पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्रालय के सहयोग से आयोजित की जा रही है।
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केंद्रीय मंत्री ने कहा कि प्रकृति सर्वोपरि है और मानव अस्तित्व के लिए उसके साथ सह-अस्तित्व अनिवार्य है। उन्होंने वानिकी के समग्र दृष्टिकोण को अपनाने, विभिन्न विभागों के बीच समन्वय बढ़ाने और ग्रीन क्रेडिट प्रोग्राम और कार्बन क्रेडिट जैसे तंत्रों के महत्व पर जोर दिया। उन्होंने कहा कि वन केवल अर्थव्यवस्था के लिए ही नहीं, बल्कि शांति और पर्यावरणीय संतुलन के लिए भी आवश्यक हैं।
कार्यशाला में वन-आधारित जैव-उत्पादों के व्यावसायीकरण, सतत वन प्रबंधन, नीतिगत ढांचे, उद्यमिता और जैव-अर्थव्यवस्था को बढ़ावा देने में नवाचार की भूमिका जैसे विषयों पर विचार-विमर्श किया जा रहा है। साथ ही कृषि-वानिकी, गैर-काष्ठ वन उत्पाद, कार्बन बाजार, वन्यजीव संरक्षण, इको-टूरिज्म और डिजिटल निगरानी जैसे विषयों पर तकनीकी सत्र आयोजित किए जा रहे हैं।
कार्यक्रम के दौरान आईसीएफआरई की महानिदेशक कंचन देवी ने केंद्रीय मंत्री भूपेंद्र यादव को मुनस्यारी (पिथौरागढ़) की पारंपरिक पायरोग्राफी कला से निर्मित उत्तराखंड के राजकीय पक्षी मोनाल का चित्र भेंट किया।
इस कार्यशाला में देशभर से वैज्ञानिकों, नीति-निर्माताओं, उद्योग जगत के प्रतिनिधियों और वन प्रबंधकों की भागीदारी हो रही है, जिसका उद्देश्य वन-आधारित जैव-अर्थव्यवस्था को सशक्त बनाने के लिए चुनौतियों और अवसरों पर व्यापक चर्चा करना है।