
अमेरिका के 50% टैरिफ पर भारत की बड़ी चुनौती – बातचीत, जवाबी वार, या नए बाजारों की तलाश?
स्वतंत्रता दिवस पर मंडराता व्यापार युद्ध का खतरा: भारत के सामने क्या हैं विकल्प?-इस साल भारत अपना स्वतंत्रता दिवस एक ऐसे नाजुक मोड़ पर मना रहा है, जब अमेरिका के साथ व्यापार को लेकर एक बड़ा विवाद खड़ा हो गया है। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने भारत से आने वाले सामानों पर पहले से लगे शुल्कों के ऊपर एक और 50% का अतिरिक्त शुल्क लगाने का ऐलान किया है। इस फैसले ने भारत को एक ऐसी स्थिति में ला दिया है जहाँ हर कदम, चाहे वो रणनीतिक हो, आर्थिक हो या राजनीतिक, बहुत सोच-समझकर उठाना होगा। ग्लोबल ट्रेड रिसर्च इनिशिएटिव (GTRI) की मानें तो, यह कदम सिर्फ भारत के व्यापार पर ही असर नहीं डालेगा, बल्कि यह भारत के ऊर्जा क्षेत्र और दूसरे देशों के साथ उसके कूटनीतिक रिश्तों की दिशा को भी प्रभावित कर सकता है। अब भारत के सामने चार मुख्य रास्ते दिखाई दे रहे हैं: अमेरिका के साथ बातचीत करके इस मसले का हल निकालना, अमेरिका को उसी की भाषा में जवाब देना, यानी जवाबी शुल्क लगाना, दूसरे देशों में अपने निर्यात को बढ़ाना, या फिर कुछ व्यापारिक रियायतें देकर इस संकट से निकलने का रास्ता खोजना, जिसमें रूस से तेल का आयात बंद करना भी शामिल हो सकता है।
Thank you for reading this post, don't forget to subscribe!हर राह के अपने फायदे और नुकसान-GTRI के संस्थापक, अजय श्रीवास्तव, बताते हैं कि हर रास्ते के अपने फायदे और नुकसान हैं। जैसे, अगर भारत अमेरिका से बातचीत करता है, तो इससे दोनों देशों के बीच तनाव कम हो सकता है। लेकिन, यह भी संभव है कि अमेरिका ऐसी शर्तें रख दे जो भारत के हित में न हों। वहीं, अगर भारत जवाबी शुल्क लगाता है, तो इससे अमेरिका पर दबाव तो बन सकता है, लेकिन इसका सीधा असर भारतीय निर्यातकों पर पड़ेगा और उन्हें नुकसान उठाना पड़ सकता है। दूसरी ओर, यूरोप, आसियान देशों, अफ्रीका, मध्य पूर्व और लैटिन अमेरिका जैसे नए बाजारों में अपनी पकड़ बनाना एक लंबी प्रक्रिया है। GTRI का अनुमान है कि इन नए बाजारों से शुरुआती दो सालों में केवल 10 से 15 अरब डॉलर की ही भरपाई हो पाएगी, जबकि मौजूदा नुकसान लगभग 50 अरब डॉलर का है।
अमेरिका पर दबाव बनाने की चतुराई भरी रणनीति-GTRI का यह भी कहना है कि अगर अमेरिका द्वारा लगाए गए इन अतिरिक्त शुल्कों की वजह से वहां के आम उपभोक्ताओं पर महंगाई और बेरोजगारी का असर बढ़ता है, तो अमेरिका के अंदर ही ट्रंप प्रशासन पर दबाव बनेगा कि वह सभी देशों के लिए टैरिफ को कम करके लगभग 15% तक ले आए। भारत के लिए सबसे समझदारी का काम यह होगा कि वह चुपचाप अमेरिका के आम मतदाताओं तक यह बात पहुंचाए कि इन टैरिफ्स से उन्हें कितना नुकसान हो रहा है। अजय श्रीवास्तव के अनुसार, आज के समय में जब आर्थिक शक्ति का इस्तेमाल एक हथियार की तरह हो रहा है, तो ऐसे में टकराव से बचना ही एकमात्र उपाय नहीं है, बल्कि हमें यह तय करना होगा कि कौन सी लड़ाई लड़नी है, अगले कदम के बारे में सोचना होगा और लंबी अवधि की रणनीति पर काम करना होगा।

