बीच सदन में गूंजा-जहां पानी ही नहीं, वहां पाइपलाइन क्यों?
- सूखते सवाल, बहते वादे: छत्तीसगढ़ विधानसभा में पानी पर सियासी घमासान
जतिन नचरानी
रायपुर। छत्तीसगढ़ विधानसभा के बजट सत्र के तीसरे दिन सदन का माहौल गर्मा गया। विषय था-जल जीवन मिशन। पानी, जो जीवन का आधार है, वही राजनीति की धुरी बन गया। सरकार ने जब दावा किया कि 2086.66 करोड़ की लागत से नल कनेक्शन लगाए गए हैं, तो विपक्ष ने सवालों की धार तेज कर दी। अजय चंद्राकर का सवाल सीधा था, 653 ऐसे गांवों में पाइपलाइन और टंकी तो बना दी गई, लेकिन बिना जलस्रोत के यह सब किस काम का? सवाल सटीक था, जवाब टालमटोल वाला। डिप्टी सीएम अरुण साव ने सफाई दी- 70% कार्य पूरा होने तक भुगतान नहीं होगा, और अगर स्रोत नहीं पाया गया, तो दोषियों पर कारर्वाई होगी। लेकिन क्या यह वादा हकीकत में बदलेगा?

बगैर पानी के पानी की योजना!
सदन में मौजूद हर कोई सोचने को मजबूर था—क्या यह योजना सिर्फ़ कागजों में तैर रही है? अजय चंद्राकर ने कड़ा रुख अपनाते हुए पूछा, क्या उन अफसरों पर कारर्वाई होगी, जिन्होंने बिना जलस्रोत के पाइपलाइन बिछाने की मंजूरी दी? लेकिन जवाब गोलमोल ही रहा।
इसी बीच विधायक राजेश मूणत ने अमृत मिशन की सच्चाई भी उजागर कर दी। उन्होंने तंज कसते हुए कहा, 411 करोड़ खर्च हुए, लेकिन रायपुर में एक भी वार्ड में काम पूरा नहीं हुआ। 24 घंटे जल आपूर्ति का सपना अब भी अधूरा है। जवाब में डिप्टी सीएम बोले—अगर ओवरलेपिंग के तथ्य हैं, तो सबूत दें।
सवाल अभी जिंदा हैं…
स्पीकर डॉ. रमन सिंह ने सरकार को निर्देश दिए कि सभी सवालों का जवाब समय पर दिया जाए, ताकि यह बहस बार-बार न उठे। लेकिन असली सवाल यह है-क्या केवल जवाब देने से गांवों में पानी पहुंचेगा? या फिर यह मुद्दा हर बार सदन में उछलता रहेगा, और गांव वाले सूखी टंकियों को ही तकते रहेंगे?
विधानसभा में गर्मागर्म बहस तो हो रही है, लेकिन क्या वाकई में सरकार उन गाँवों तक पानी पहुँचाएगी, जो सिर्फ़ आंकड़ों में चमक रहे हैं? या फिर ये योजनाएँ भी सूखते जलस्रोतों की तरह सिर्फ़ राजनीति की जमीन को ही सींचती रहेंगी?

