
एक बार फिर जिंदा हुई ‘उमराव जान’: मुज़फ़्फर अली बोले – अब ये फिल्म सिर्फ देखी नहीं, महसूस की जाएगी
उमराव जान: 43 साल बाद फिर से पर्दे पर, और इस बार पूरी रूह के साथ!-43 साल बाद, मुज़फ़्फर अली की क्लासिक फिल्म ‘उमराव जान’ 27 जून को सिनेमाघरों में वापसी कर रही है! नेशनल फिल्म डेवलपमेंट कॉर्पोरेशन और नेशनल फिल्म आर्काइव ऑफ इंडिया के ज़रिए पूरी तरह से रिस्टोर की गई ये फिल्म, अब एक नए अंदाज़ में दर्शकों के सामने होगी। यह सिर्फ़ एक फिल्म नहीं, बल्कि एक ऐसा भावनात्मक सफ़र है जो आपको अपनी ओर खींच लेगा।
Thank you for reading this post, don't forget to subscribe!मां की यादें, बेटी के एहसास-मुज़फ़्फर अली का मानना है कि ‘उमराव जान’ सिर्फ़ एक फिल्म नहीं, बल्कि एक ऐसा अहसास है जिसे पिछली पीढ़ी ने जिया और अब नई पीढ़ी इसे महसूस करेगी। OTT पर उपलब्ध न होने के कारण, फिल्म का जादू बरकरार रहा है। रिस्टोरेशन के बाद, फिल्म में नई जान आ गई है, भावनाओं का ऐसा ज्वार जो आपको बांधे रखेगा। यह फिल्म रिश्तों, पीढ़ियों और संस्कृति के बीच एक मज़बूत कड़ी साबित होगी।
अवध की सच्ची तस्वीर: लखनऊ की गलियाँ और एक औरत का दर्द-19वीं सदी के लखनऊ की पृष्ठभूमि पर आधारित, यह फिल्म तवायफ उमराव जान की कहानी कहती है। मुज़फ़्फर अली, जो खुद लखनऊ से हैं, ने अवध की सच्चाई, उसकी तहज़ीब और एक औरत के दर्द को बखूबी पर्दे पर उतारा है। उन्होंने अवध को उसी तरह दिखाने की कोशिश की है जैसे सत्यजीत रे ने बंगाल को दिखाया था। यह फिल्म उस दौर की संस्कृति और समाज की गहरी समझ देती है।
‘उमराव जान’: सिर्फ़ किताब नहीं, मेरी ज़िंदगी का आईना-मिर्ज़ा हादी रुसवा के उपन्यास ‘उमराव जान अदा’ पर आधारित, इस फिल्म में मुज़फ़्फर अली का लखनऊ भी पूरी तरह से समाया हुआ है। हर सीन, हर कपड़ा, त्योहार, कविता और एहसास में उनकी ज़िंदगी की झलक दिखाई देती है। उन्होंने अपने अनुभवों को किताब के साथ जोड़कर फिल्म को एक ऐसा स्वरूप दिया है जो किताब से भी आगे बढ़कर दिल को छूता है। यह फिल्म उनके जीवन का एक अहम हिस्सा है।
रेखा: एक तवायफ से बढ़कर एक इंसान-रेखा ने इससे पहले भी तवायफ की भूमिकाएँ निभाई हैं, लेकिन मुज़फ़्फर अली ने उन्हें एक औरत के रूप में दिखाया है – एक इंसान, जो नाज़ुक है, जिसे दर्द होता है और जो अंदर से टूटती भी है। रेखा ने किरदार में खुद को पूरी तरह से ढाल लिया। अली ने उन्हें पूरी आज़ादी दी ताकि वो किरदार को पूरी तरह जी सकें। उनकी अदाकारी फिल्म की जान है।
फारूक़ शेख, राज बब्बर, नसीरुद्दीन शाह: रेखा की परफॉर्मेंस पर हावी नहीं-अली ने ऐसे अभिनेता चुने जो रेखा की परफॉर्मेंस पर हावी न हों। फारूक़ शेख, राज बब्बर और नसीरुद्दीन शाह ने अपनी सादगी और शालीनता से किरदारों को जिया, बिना किसी नाटकीयता के। उनकी उपस्थिति फिल्म को और भी खूबसूरत बनाती है।
‘इन आँखों की मस्ती…’: संगीत जो रूह तक उतरता है-खय्याम के संगीत और शहरयार की शायरी ने फिल्म की आत्मा को जीवंत किया है। गानों ने उमराव जान के किरदार को और भी गहराई दी है। ‘दिल चीज़ क्या है’, ‘इन आँखों की मस्ती’ जैसे गाने आज भी लोगों के दिलों में बसते हैं। संगीत फिल्म का एक अहम हिस्सा है।
एक यादगार दस्तावेज़: ‘उमराव जान’ की कॉफी टेबल बुक-फिल्म के साथ ही, इसके सेट की यादों को भी संजोया जा रहा है। मुज़फ़्फर अली एक लिमिटेड एडिशन कॉफी टेबल बुक भी लॉन्च करने जा रहे हैं, जिसमें फिल्म के पीछे की झलकें, तस्वीरें और भावनाएं होंगी। यह फिल्म प्रेमियों के लिए एक खास तोहफ़ा होगी।

