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मानवीय रिश्तों का बदलता गणित


गिरीश्वर मिश्र

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रिश्ते, प्रेम और अपराध के बीच पनपने वाली तिकड़ी आज भारतीय समाज को व्यथित और चिंतित कर रही है। ऐसा तब हो रहा है जब कि कोई भी व्यक्ति रिश्तों में ही जन्म लेता है, उसी में पलता और उसी के सहारे जीवन-यात्रा में आगे भी बढ़ता है। वस्तुतः इन रिश्तों का जैविक आधार है जो माँ के पेट में स्थित गर्भ के साथ अनिवार्य जुड़ाव की व्यवस्था और अवस्था में शुरू होता है। यह एक अटूट, अपरिहार्य और अनिवार्य बंधन में बांधता है। अत: इस रिश्ते को जीवनपर्यंत चलते रहने की प्रासंगिकता बनी रहती है।

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सच कहें तो नया जीव अपने जनक (पिता) और जननी (माता) का उत्पाद होने के कारण वास्तविक अर्थ में उन दोनों का ऋणी होता है। कदाचित इसीलिए भारतीय समाज में ऋण की अवधारणा प्राचीन काल से सबके मन में बसी आ रही है। यह पीढ़ियों के बीच पारस्परिकता की सुदृढ़ आधारशिला रचती है। इसे बनाए रखने में संयुक्त परिवार और अन्य सहायक सामाजिक संस्थाओं और मान्यताओं की सहायक भूमिका थी। पीढ़ी-दर-पीढ़ी इस तरह की व्यवस्था अधिकांश क्षेत्रों में चलती रही है। आधुनिक युग में विस्थापन, पलायन, आव्रजन (माइग्रेशन) ने इस तरह की व्यवस्था को चुनौती दी है। जीवन को सुखी बनाने में आर्थिक तत्वों की बढ़ती आत्यन्तिक भूमिका के चलते जीवन की परिस्थितियाँ तेज़ी से उलट-पलट रही हैं। इन सबके प्रभाव में युवा वर्ग का एक बड़ा हिस्सा भ्रमित हो रहा है और रिश्तों की अहमियत को नहीं पहचान पा रहा है। वह इन्हें नज़र अन्दाज़ कर रहा है और उसे स्वच्छंदता के दायरे में नए ढंग से परिभाषित करने में जुटा हुआ है। वह माता-पिता पक्ष के तमाम रिश्तों (यथा-मौसेरे, चचेरे, ममेरे, फ़ुफेरे आदि) के लफड़े में नहीं पड़ना चाहता। इस तरह के सभी रिश्तों को अपने लिए अनावश्यक बंधन मानता है और सिर से उतार फेंकना चाहता है। अपने जीवन और कर्म में बाधा समझ कर वह इनसे किनारा रखता है। वह अक्सर उनकी अवहेलना और उपेक्षा करता है। और तो और अब रिश्तों से अलगाव की श्रेणी में माता-पिता भी शामिल होने लगे हैं। इसकी पुष्टि वृद्ध माता-पिता की देखरेख न करने की बढ़ती घटनाओं में आसानी से देखी जा सकती है।

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बचपन में माता-पिता या किसी प्रौढ़ अभिभावक की देखरेख के अभाव में शिशु के जीवन यानी उसके अस्तित्व की कल्पना नहीं की जा सकती। एक शिशु माता-पिता के साथ के रिश्तों के केंद्र में रहता है परंतु उम्र के साथ रिश्तों की दिशा, विस्तार और वरीयता बदलती है। किशोर और युवा होते-होते वह परनिर्भर (डिपेंडेंट) शिशु आत्मनिर्भर (इंडिपेंडेंट) होने लगता है। फिर वह समय भी आता है जब शारीरिक, मानसिक और सामाजिक विकास के दौरान वह रिश्तों की बागडोर अपने हाथों में लेकर उनकी दिशा बदलने लगता है। इस कार्य में भावनात्मक परिवर्तन ख़ास भूमिका अदा करते हैं जो किशोरावस्था विशेष रूप से सक्रिय होते हैं। लड़के और लड़कियाँ एक-दूसरे के प्रति आकर्षित होते हैं। व्यक्ति के विकास के चरणों का एक क्रम प्रत्येक संस्कृति में मिलता है। इसमें रिश्तों की बनावट और बुनावट केंद्रीय महत्व की होती है। व्यक्ति के विकास के लिए आवश्यक जीवन-रस रिश्तों से ही मिलता है।

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पिछले कुछ दिनों में ऐसी घटनाओं की ख़बरें मीडिया में तेज़ी से आ रही हैं जिनमें निजी रिश्तों में बढ़ती दरारों के चलते बहुत कुछ अवांछित हो रहा है। ख़ासकर उन रिश्तों में जो युवाओं द्वारा ख़ुद अपने निर्णय से सामाजिक मान्यताओं के अंकुश से परे जाकर अंजाम दिए जाते हैं। एक बात साफ़ है कि इन बेहद निजी मामलों के मूल में अक्सर भावनात्मक त्रासदी ही मुख्य है। पारस्परिक अविश्वास के कारण प्रतिशोध, धोखा और असंतोष की भावना तेज़ी से बढ़ती है। इस प्रसंग में यह भी रेखांकित किया जाना चाहिए कि आक्रामकता को आज एक परिपक्व और प्रौढ़ व्यक्तित्व की निशानी माना जा रहा है। एक सीमा के बाद रिश्तों के बीच उपजा भावनात्मक संघर्ष प्रज्वलित होकर हिंसक रूप लेने लगता है। हिंसा भड़कने पर बहुत कुछ जीवनविरोधी घटित होने लगता है। आज इस तरह की परिस्थितियों में न केवल आत्महत्याएँ हो रही है बल्कि एक-दूसरे की जान तक ले ली जा रही है। इन स्वयंभू रिश्तों के बीच भावनात्मक उबाल बड़ी आसानी से अकेले व्यक्ति के स्व या आत्म के बोध को प्रभावित करता है। अहम को पहुँच रही चोट की तीव्रता उनमें गहरे मानसिक आघात को जन्म देती है। तब पति, पत्नी, साथी और प्रेमी एक-दूसरे की हत्या तक करने के लिए तैयार हो जाते हैं। मौक़ा पाते ही वे ऐसे जघन्य और आपराधिक कार्य को अंजाम देने में भी नहीं हिचकते।

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आज सहिष्णुता के सिमटते दायरों के बीच आपसी रिश्तों में दरारें तेज़ी से बढ़ रही हैं। इस संदर्भ में यह गौरतलब है कि आज तलाक और अलग-अलग जीवन बिताने (सेपेरेशन) के फैसले बड़ी आसानी से लिए जा रहे हैं। ऐसा लगता है मानों विवाह के बाद तलाक अगला संस्कार है। अकेले, स्वतंत्र और अपने ढंग से अमर्यादित जीवन जीने की प्रवृत्ति आधुनिकीकरण की पहचान होती जा रही है। इसके अंतर्गत जुड़ने और निजी जीवन को अपने पसंदीदा ढंग से जीने की छूट ली जाती है। इसलिए “लिव-इन रिलेशनशिप“ का स्वेच्छाचार स्त्री-पुरुष के बीच अनर्गल शारीरिक संबंध बनाने की पर्याप्त छूट दे देता है। इस पर कोई सामाजिक नियंत्रण नहीं रहता है और अब इसे प्रौढ़ जीवन जीने की एक विधा मानी जाने लगी है। आत्म-निर्णय और एक-दूसरे के साथ रहने की मौखिक सहमति ही इसके लिए पर्याप्त होती है। इसे ग़ैर-नाजायज मान कर विहित की श्रेणी में रखा जाता है। ऐसे रिश्तों के संदर्भ में समाज के मानक और परिवार की स्वीकृति की भूमिका गौण होती है।

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ऐसे बहुतेरे मामलों में ऊपरी आकर्षण ही प्रमुख होता है जो टिकाऊ नहीं होता है। जब यह आकर्षण आयु बढ़ने या किसी तीसरे के प्रति आकर्षण के कारण घटता है या ऊब, थकान के कारण नीरस और बासी पड़ने लगता है तो दोनों व्यक्तियों के बीच जुड़ने और जुड़े रहने का कोई ठोस आधार नहीं बचता और वे अलग हो जाते हैं। जब इस घटनाक्रम में प्रतिशोध और अविश्वास को अवसर मिलता है तो अपने साथी को पीड़ित करने, दंडित करने की सोच प्रबल होने लगती है। चूँकि ऐसे जोड़े अपने को दूसरों से (समाज से) काट कर रखते हैं, कोई समाधान की दिशा नहीं मिलती और अवसर पाकर उनके मन में हत्या जैसे घोर कदम उठाने की तैयारी होने लगती है। समय पर हस्तक्षेप न होने पर वे ऐसे आपराधिक कृत्य को अंजाम देने में सफल हो जाते हैं।

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रिश्तों के इस बदलते परिदृश्य में कई किरदार सक्रिय होते दिखते हैं। आर्थिक स्थिति में सुधार के साथ एक तरह के उदार नजरिये को अपनाना और उच्छृंखल संबंधों की मीडिया, फ़िल्म और समाज में लगातार प्रस्तुति और स्वीकृति इस स्थिति को बढ़ावा दे रहे हैं। आज निरंकुश मीडिया से छन कर जो ज्ञान-विज्ञान और अज्ञान की बाढ़ आ रही है उससे भयानक मानसिक प्रदूषण एक महामारी के रूप में फ़ैल रहा है। उसकी चपेट में बच्चे, जवान और बूढ़े सभी आ रहे हैं। इसके ऊपर अंकुश का उपाय तात्कालिक आवश्यकता है। उद्दाम आकांक्षाओं के अनंत आकाश में उड़ान भरने की असीमित कामनाएँ और आत्म नियंत्रण एवं आत्म विवेक की जगह आत्म-प्रकाशन को मूल्य के रूप में स्थापित करना भी आज की परिस्थिति पैदा करने में सहायक हो रही है। निर्द्वंद्व स्वेच्छाचार की छूट के बढ़ते प्रत्यक्ष और परोक्ष बहाने आज के स्वतंत्र मानस वाले मानुष को सीमाओं को तोड़ने और वर्जनाओं को ख़ारिज करने को निरंतर उकसाते हैं।

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रिश्तों की झीनी चादर के ताने-बाने कैसे चलें और इसकी बुनावट कैसी हो, यह एक सांस्कृतिक प्रश्न या चुनौती है जिस पर गम्भीर विचार की जरूरत है पर तात्कालिक दबावों के बीच इसके लिए आवश्यक उपक्रम बौने, छिछले और दिखावटी साबित हो रहे हैं। जीवन मूल्यों के प्रश्न व्यापक महत्व के होते हैं।

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निर्मम, निरंकुश, असहिष्णु और स्वार्थपरायण समाज को लेकर किसी विकसित भारत की और विवेकशील मनुष्य की कल्पना नहीं की जा सकती। रिश्तों का गणित कोई अमूर्त बौद्धिक व्यापार न होकर दैनंदिन जीवन की अनिवार्य हकीकत है। इसे समझना और आवश्यकतानुसार समाधान निकालना प्राथमिकता होनी चाहिए। इन्हें राजनीति, शिक्षा, संस्कृति और उन्नति के उद्यमों के बारे में विमर्श के केंद्र में होना चाहिए।

(लेखक, महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय, वर्धा के पूर्व कुलपति हैं।)

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